भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीबिल्वमंगलजी) (४६ लाजनि को मार्यो राजा चाहे अपघात कियो, जियो नहीं जात ‘भक्ति लेशहूँ न आयो है’। करि समाधान निज ग्राम आये किन्दुबिल्व, जैसो कछु सुन्यो यह परचो लै गायो है।। १६२।। देवधुनि सोत हो अठारै कोस आश्रम तैं, सदाई असनान करें धरैं योग्यताई कौं। भयो तन वृद्ध तऊँ छोड़ैं नहीं नित्यनेम, प्रेम देखि भारी निसि कही सुखदाई कौं।। ‘आवो जिनि ध्यान करौ, करौ मत हठ ऐसौ’, मानी नहीं ‘आऊँ मैं हीं’ ‘जानौ कैसे आई कौं’। फूले देखौ कंज तब कीजियो प्रतीति मेरी, भई वही भाँति सेवैं अबलौं सुहाई कौं।। १६३।। श्रीश्रीधराचार्यजी श्रीधर श्रीभागौत में, परम धरम निरनै कियौ।। तीन काण्ड एकत्व, सानि कोउ अज्ञ बखानत। कर्मठ ज्ञानी ऐंचि, अर्थ कौ अनरथ बानत।। परमहंस सहिंता, विदित टीका बिसतार्यौ। षट्शास्त्रनि अविरुद्ध, वेद संमतहिं विचार्यौ।। परमानन्द प्रसाद तें, माधौ सुकर सुधारि दियौ। श्रीधर श्रीभागौत में परम धरम निरनै कियौ।। ४५।। पंडित समाज बड़े-बड़े भक्तराज जिते, भागवत टीका करि आपस में रीझिये। भयो जू विचार काशीपुरी अविनासी माँझ, सभा अनुसार जोई-सोई लिखि दीजिये।। ताको सो प्रमान भगवान बिन्दुमाधौजी है, साधौ यही बात धरि मन्दिर में लीजिये। धरे सब जाय प्रभु सुकर बनाय दियो, कियो सर्वोपरि लैकै, चल्यो मति धीजिये।। १६४।। मास परायण सातवाँ विश्राम श्रीबिल्वमंगलजी कृष्ण कृपा कोपर प्रगट विल्वमंगल मंगलस्वरूप।। ‘करणामृत’ सुकवित्त, उक्ति अनुछिष्ट उचारी। रसिकजनन जीवन, हृदय जै हारावलि धारी।। हरि पकरायो हाथ, बहुरि तहँ लियो छुड़ाई। कहा भयो कर छुटे, बदौं जो हिय तें जाई।।