श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०) (श्री भक्तमाल चिन्तामणि सँग पायकै, ब्रजवधू केलि बरनी अनूप। कृष्ण कृपा कोपर प्रगट विल्वमंगल मंगलस्वरूप।। ४६।। कृष्णवेना तीर एक द्विज मतिधीर रहै, ह्वै गयो अधीर संग चिन्तामनि पाइकै। तजी लोकलाज हिये वाही को जु राज भयो, निसिदिन काज वहै रहै घर जाइकै।। पिता को सराध नेकु रह्यो मन साधि, दिन शेष में आवेस चल्यो अति अकुलाइकै। नदी चढ़ी रही भारी पैये न अवारी नाव, भाव भर्यो हियो जियो जात नधि जाइकै।। १६५।। करत विचार वारि धार में न रहें प्रान, तातें भली धारि मित्र सनमुख जाइयै। परे कूदि नीर कछु सुधि न सरीर की है, वही एक पीर कब दरसन पाइयै।। पैयत न पार तन हारि भयो बूडिवे कौं, मृतक निहारि मानी नाव मन भाइयै। लगेई किनारे जाय चले पग धाय चाय, आये पट लागे निसि आधी सो बिहाइये।। १६६।। अजगर घूमि झूमि भूमि कौं परस कियो, लियोई सहारौ चढ़यो छत पर जायकै। ऊपर किवार लगे पर्यो कूदि आँगन में, गिरयो यों गिरत रागी जागी शोर पायकै।। दीपक बराइ जोपै देखै विल्वमंगल है, 'बड़ोई अमंगल तूँ कियो कहा आयकै'। जल अन्हवाय सूखे पट पहिराय 'हाय! कैसे करि आयो जलपार द्वार धायकै'।। १६७।। 'नौका पठवाई द्वार लाव लटकाई देखि, मेरे मनभाई मैं तो तबै लई जानिकै। 'चलो देखौं अहो! यह कहा धौं प्रलाप करै', देख्यौ विषधर महा खीजी अपमानिकै।। 'जैसो मन मेरे हाड़-चाम सौं लगायो तैसो श्याम सौं लगावो तोपै जानियें सयानिकै। मैं तो भये भोर भजौं युगलकिशोर अब तेरी तुही जानै चाहौ करौ मन मानिकै'।। १६८।। खुलि गई आँखै अभिलाखैं रूपमाधुरी कौ, चाखैं रसरंग औ उमंग अंग न्यारियै। बीन लै बजाई गाई विपिन निकुंज क्रीड़ा, भयो सुखपुंज जापै कोटि विषै वारियै।। बीति गई राति प्रात चले आप आपकौ जू, हिये वही जाप दृग नीर भरि डारियै। सोमगिरी नाम अभिराम गुरु कियो आनि, सकै को बखानि लाल भुवन निहारियै।। १६९।। रहे सो बरस रससागर मगन भये, नये-नये चोज के श्लोक पढ़ि जीजिये। चले वृन्दावन मन कहै कब देखौं जाइ, आइ मग माँझ एक ठौर मति भीजिये।। पर्यो बड़ो शोर दृग कोरकैं न चाहै काहू, तहाँ सर तिया न्हाति देखि आखैं रीझिये। लगे वाके पाछे काँछ काछै की न सुधि कछू, गई घर आछे रहे द्वार तन छीजिये।। १७०।। आयो वाको पति द्वार देखे भागवत ठाढ़े, बड़ो भागवत पूछी बधू सौं जनाइये। कही जू पधारो पाँव धारो गृह पावन कौं, पावन पखारौं जल धारौं सीस भाइये।।