श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२) (श्री भक्तमाल कृष्ण कृपा कहि बेलि, फलित सत्संग दिखायो। कोटि ग्रन्थ को अर्थ, तेरह विरचन में गायो।। महा समुद्र भागौत तें, भक्तिरतन राजी रची। कलि जीव जंजाली कारनै, विष्णुपुरी बड़ी निधि सँची।।४७।। जगन्नाथ क्षेत्र माँझ बैठे महाप्रभु जू वे, चहुँ ओर भक्त भूप भीर अति छाई है। बोले 'विष्णुपुरी पुरी काशी मध्य रहें जाते, जानियत मोक्ष चाह नीकी मन आई है'। लिखी प्रभु चीठी 'आपु मनिगन माला एक, दीजिये पठाइ मोहिं लागती सुहाई है'। जानि लई बात निधि भागवत रत्नदाम, दइ पठै आदि मुक्ति खोदिकै बहाई है।।१७७।। श्रीज्ञानदेवजी विष्णुस्वामि सम्प्रदाय दृढ़, ज्ञानदेव गम्भीर मति।। नाम तिलोचन शिष्य, सूर शशि सदृश उजागर। गिरा गंग उनहारि, काव्य रचना प्रेमाकर।। आचारज हरिदास, अतुल बल आनँददायन। तेहिं मारग वल्लभ, विदित पृथु पधति परायन।। नवधा प्रधान सेवा सुदृढ़, मन वच क्रम हरि चरन रति। विष्णुस्वामि सम्प्रदाय दृढ़ ज्ञानदेव गम्भीर मति।। ४८।। विष्णुस्वामि सम्प्रदाई बड़ेई गम्भीर मति, ज्ञानदेव नाम ताकी बात सुनि लीजिये। पिता गृह त्यागि आइ ग्रहन संन्यास कियो, दियो बोलि झूठि तिया नहीं गुरु कीजिये।। आई सुनि बधू पाछैं कह्यो जान्यो मिथ्यावाद, 'भुजनि पकरि मेरे संग करि दीजिये'। ल्याई सो लिवाइ जाति अति ही रिसाइ दियो, पाँति में ते डारि रहें दूरि नहीं छीजिये।।१७८।। भये पुत्र तीन तामें मुख्य बड़ो ज्ञानदेव, जाकी कृष्णदेव जू सौं हिये की सचाई है। वेद न पढ़ावे कोऊ कहैं सब जाति गई, लई करि सभा अहो! कहा मन आई है।। 'बिनस्यो ब्रह्मत्व' कही 'श्रुति अधिकार नाहिं', बोल्यो यों निहारि 'पढ़ै भैंसा' लै दिखाई है। देखि भक्तिभाव चाव भयो आनि गहैं पाँव, कियोई सुभाव वही गही दीनताई है।। १७६।।