भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीत्रिलोचनजी) (५३ श्रीत्रिलोचनजी भयें उभै शिष्य नामदेव श्री तिलोचनजू, सूर शशि नाईं कियो जग में प्रकास है। नामा की तो बात कहि आये सुनो दूसरे की, सुनेई बनत भक्त कथा रसरास है॥ उपजे बनिककुल सेवें कुल अच्युत कौं, ऐपै नहिं बनै एक तिया रहे पास है। टहलुवा न कोई 'साधु मन ही की जानि लेत', यही अभिलाष सदा दासनि को दास है॥१८०॥ आये प्रभु टहलुवा रूप धरि द्वार पर, फटी एक कामरी पन्हैयाँ टूटी पाँय हैं। निकसत पूछैं 'अहो! कहाँ ते पधारे आप? 'बाप महतारी और देखिये न' गाय हैं॥ 'बाप महतारी मेरे कोऊ नाहिं साँची कहौं गहौं मैं टहल जोपै मिलत सुभाय हैं'। 'अनमिल बात कौन? दीजिये जनाय वहू' 'पाऊँ पाँच सात सेर उठत रिसाय हैं'॥१८१॥ चारि हू बरन की जु रीति सब मेरे हाथ, साथ हू न चाहौं करौं नीके मन लाइकै। भक्तन की सेवा सो तौ करत जनम गयो, नयो कछु नाहिं डारे बरस बिताइकै॥ अन्तरयामी नाम नेरो चेरो भयो तेरे! हौं तो, बोल्यो 'भक्तभाव खावौ निशंक अघाइकें'। कामरी पन्हैयाँ सब नई करि दई और, मीड़िकै, न्हवायो तन मैल कौं छुटाइकै॥ १८२॥ बोल्यो घरदासी सौं 'तूँ रहै याकी दासी होइ, देखियो उदासी देत ऐसो नहीं पावनौ। खाय सो खवावो सुख पावो नित-नित हिये, जियैं जग माहि जौलौं मिलि गुन गावनौ॥ आवत अनेक साधु भावत टहल हिये, लिये चाव दाबें पाँव सबनि लड़ावनौ। ऐसे ही करत मास तेरह व्यतीत भये, गये उठि आपु नेकु बात को चलावनौ॥ १८३॥ एक दिन गई ही परोसिन कैं भक्तबधू, पूछि लई बात 'अहो! काहे कौं मलीन है'। बोली मुसुकाय वे टहलुवा लिवाय ल्याये, क्योंहू न अघाय खोट पीसि तन छीन है॥ काहू सौं न कहौ यह गहौ मन माँझ एरी, 'तेरी सौं सुनैगो जोपै जात रहै भीन है'। सुनि लई यही नेकु गये उठि हुती टेक, दुखहूँ अनेक जैसे जल बिन मीन है॥ १८४॥ बीते दिन तीनि अन्न-जल करि हीन भये, “ऐसो सो प्रवीन अहो! फेरि कहाँ पाइयें”। बड़ी तू अभागी ! बात काहे कौं कहन लागी? रागी साधुसेवा में जु कैसे करि ल्याइयें॥ भई नभ वानी तुम खावो पीवो पानी यह, मैं ही मति ठानी मोकौं प्रीति रीति भाइयें। मैं तो हौं अधीन तेरे घर ही में रहौं लीन, जोपै कहौ सदा सेवा करिवे कौं आइयें॥ १८५॥ कीने हरिदास मैं तौ दासहू न भयौं नेकु, बड़ो उपहास मुख जग में दिखाइयै। कहैं जन भक्त कहा भक्ति हम करी कहो? अहो ! अज्ञताई रीति मन में न आइयै॥