श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 195 में से
संदर्भ में पढ़ें५४) (श्री भक्तमाल उनकी तो बात बनि आवै सब उनही सौं, गुन ही कौं लेत मेरे औगुन छिपाइये। आये घर माँझ तऊ मूढ़ मैं न जानि सक्यौ, आवैं अब क्योंहूँ धाय पाँय लपटाइये ॥१८६॥ श्रीवल्लभाचार्यजी हिये में सरूप सेवा करि अनुराग भरे, ढरे और जीवन की जीवनि कौं दीजिये। सोई लै प्रकास घर-घर में विलास कियो, अति ही हुलास फल नैननि कौं लीजिये ॥ चातुरी अवधि नेकु आतुरी न होति किहूँ, चहुँ दिसि नाना राजभोग सुख कीजिये। वल्लभ जू नाम लियो पृथु अभिराम रीति, गोकुल में धाम पानि सुनि मन रीझिये ॥१८७॥ गोकुल के देखिवे कौं गयौ एक साधु सूधो, गोकुल मगन भयो रीति कछु न्यारिये। छोंकर के वृक्ष पर बटुवा झुलाय दियो, कियो जाय दरसन सुख भयो भारिये ॥ देखै आइ नाहीं प्रभु फेरि आप पास आयो, चिन्ता सौं मलीन देखि कही जा निहारिये। वैसेई सरूप कई गई सुधि बोल्यो आनि, लीजिये पिछानि कह्यो सेवा नित धारिये ॥१८८॥ खुलि गईं आखें अभिलाखैं पहिचानि कीजै, दीजै जू बताइ मोहिं पाऊँ निज रूप है। कही जावो वाही ठौर देखौ प्रेम लेखौ हिये, लिये भाव सेवा करौ मारग अनूप है॥ देखिके मगन भयो लयो उर धारि हरि, नैन भरि आये जान्यो भक्ति को स्वरूप है। निसिदिन लग्यौ पग्यौ जग्यौ भाग पूरन हो पूरन चमत्कार कृपा अनुरूप है॥ १८६॥ मास परायण आठवां विश्राम श्रीकुलशेखरजी सन्त साखि जानें सबै, प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥ भक्तदास इक भूप, श्रवन सीताहर कीनों। मार मार कर खड्ग, बाजि सागर में दीनौ॥ नरसिंह कौ अनुकरण, होइ हिरनाकुश मार्यो। व्है भयौ दसरत्थ, राम बिछुरत तन डार्यो॥ कृष्ण दाम बाँधे सुने, तिहिं छन दीनो प्रान। सन्त साखि जानें सबै, प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥४६॥ सन्त साखि जानें कलिकाल में प्रगट प्रेम, बड़ोई असत जाके भक्ति में अभाव है। हुतो एक भूप रामरूप ततपर महा, राम ही की लीला गुन सुनैं करि भाव है॥ विप्र सौं सुनावै सीता चोरी कौ न गावै, हियो खरो भरि आवै वह जानत सुभाव है। पर्यो द्विज दुखी निज सुवन पठाइ दियो, जानै न सुनायो भरमायो कियो घाव है ॥ १६०॥