भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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५६) (श्री भक्तमाल

देखिकैं लजानौं 'कहा कियौं मैं अजानौं' ! नृप कही 'प्रेत मानौं यही हरि सौं बिगारियै' । कही जगन्नाथदेव 'लै प्रसाद जावो उहाँ, ल्यावो हाथ बोवै बाग' सोई उर धारियै ।। चले तहाँ धाइ भूप आगे मिल्यो आइ हाथ, निकस्यो लगाइ हियै भयौ सुख भारियै। ल्याये कर फूल ताके भये फूल दौना के जु, नितहीं चढ़त अंग गन्ध हरि प्यारियै ।। १६५ ।।

श्रीकर्माबाईजी

हुती एक बाई ताको करमा सुनाम जानि, बिना रीति भाँति भोग खिचरी लगावहीं। जगन्नाथदेव आपु भोजन करत नीकैं, जिते लगैं भोग तामें यह अति भावहीं ।। गयो तहाँ साधु मानि बड़ो अपराध करै, भरै बहु स्वांस सदाचार लै सिखावहीं। भई यों अवार देखें खोलिकै किवार जोपै, जूठनि लगी है मुख धोये बिनु आवही ।। १६६ ।। पूछी 'प्रभु! भयो कहा? कहिये प्रगट खोलि, बोलिहू न आवै हमें देखि नई रीति है। 'करमा सुनाम एक खिचरी खवावै मोहिं, मैं हूँ नित पाऊँ जाइ जानि साँचि प्रीति है ।। गयो मेरो सन्त रीति भाँति सो सिखाइ आयो, मत मो अनन्त बिनु जाने यों अनीति है। कही वही साधु सौं 'जु! साधि आवौ वही बात' जाइकै सिखाई हिय आई बड़ी भीति है ।। १६७ ।।

सिलपिल्ले भक्त उभयबाईजी

सिलपिल्ले भक्त उभै बाई सोई कथा सुनौ, एक नृपसुता एक सुता जिमींदार की। आये गुरु घर देखि सेवा ढिंग बैठी जाइ, कही ललचाइ पूजा कीजै सुकुमार की ।। दियो शिलाटूक लैके नाम कहि दियो वही, कीजिये लगाइ मन मति भवपार की। करत-करत अनुराग बढ़ि गयो भारी, बड़ी ये विचित्र रीति यही सोभा सार की ।। १६८ ।। पाछिले कवित्त माँझ दुहुँन की एकै रीति, अब सुनौ न्यारी-न्यारी नीके मन दीजिये । जिमींदार सुता ताके भये उभै भाई रहैं, आपुस में बैर गाँव मार्यो सब छीजिये ।। तामें गई सेवा इन बड़ोई कलेस कियौ, जियो नाहिं जात खान-पान कैसें कीजिये। रहे समुझाय याहि कछु न सुहाय तब, कही जाय ल्यावै तेरे दोऊ सम धीजिये ।। १६६ ।। गई वाही गाँव जहाँ दूसरो जू भाई रहै, बैठ्यौ हो अथाई माँझ कही वही बात है। 'लेवो जू पिछानि तहँ बैठे एक ठौर प्रभु, बोलि उठ्यो कोऊ 'बोलि लीजैं प्रीति गात है' ।। भई आँखि राती लागी फाटिवे कौं छाती, सो पुकारी सुत आरत सौं मानौं तन पात है। हिये आइ लागे सब दुख दूर भागे कोऊ बड़े भाग जागे घर आई न समात है ।। २०० ।। सुनौ नृपसुता बात भक्ति गात-गात पगी, भगी सब विषैवृत्ति सेवा अनुरागी है। ब्याही ही विमुख घर आयो लैन वहै वर, खरी अरबरी कोऊ चित चिन्ता लागी है ।।

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