भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीसुतों को विष दिया दो बाई) (५७ करि दई संग भरी अपने ही रंग चली, अलीहूँ न कोई एक वही जासौँ रागी है। आयो ढिंग पति बोलि कियो चाहै रति वाकी, और भई गति मति आवै विथा पागी है।।२०१।। ‘कौन वह विथा? ताकौ कीजियै जतन वेगि, बड़ो उदवेग नेकु बोलि सुख दीजियै। ‘बोलिवो जौ चाहौ तौपै करौ हरिभक्ति हिये, बिन हरिभक्ति मेरो अंग जिन छीजियै।। आयो रोष भारी तब मन में विचारी वा ‘पिटारी में जु कछु सोई लैकेँ न्यारो कीजियै’। करी वही बात मूसि जल माँझ डारि दई, नई भई ज्वाला जियो जात नहीं खीजियै।।२०२।। तज्यो जल-अन्न अब चाहत प्रसन्न कियो, होत क्यौँ प्रसन्न जाको सबरस लियो है। पहुँचे भवन आइ दई सो जताइ बात, गात अति छीन देखि कहा हठ कियो है।। सासु समुझावै कछु हाथ सौं खवावै याकौँ, बोलिहू न भावै तब धरकत हियो है। ‘कहै सोई करें अब पाँय तेरे परैं हम’, बोली ‘जब वेई आवैं तौही जात जियो है’।।२०३।। आये वाही ठौर भौर आई तनु भूमि गिरयो, ढरयो जल नैन सुर आरत पुकारी है। भक्तिवश श्याम जैसे कामवश कामी नर, धाइ लागे छाती सो जु संग सो पिटारी है।। देखि पति सासु आदि जगत विवाद मिट्यो, वाद ही जनम गयो नेकु न सँभारी है। किये सब भक्त हरि साधुसेवा माँझ पगे, जगे कोउ भाग घर बधू योँ पधारी है।।२०४।। भक्तों के हित सुतों को विष दिया, दो बाईजी भक्तन के हित सुत विष दियौ उभै बाई, कथा सरसाई बात खोलिकै बताइयै। भयो एक भूप ताके भक्त हूँ अनेक आवैं, आयो भक्तभूप तासौँ लगन लगाइयै।। नितहीँ चलत ऐपै चलन न देत राजा, बितयो बरष मास कहै भोर जाइयै। गई आस टूटि तन छूटिवे की रीति भई, लई बात पूछि रानी सबै लै जनाइयै।।२०५।। दियो सुत विष रानी जानी नृप जीवै नाहिं, सन्त हैं स्वतन्त्र सो इन्हेंहि कैसैं राखियै। भये बिन भोर बधू शोर करि रोय उठी, भोय गई रावले में सुनी साधु भाषियै।। खोलि डारी कटि पट भवन प्रवेस कियो, लियो देखि बालक कौँ नील तनु साषियै। पूछ्यौ भूप तिया सौं ‘जू साँचे कहि कियो कहा?’ कही ‘तुम चाल्यौ चाहौ नैन अभिलाषियै’।।२०६।। छाती खोलि रोये सन्त बोलिहूँ न आवै मुख, सुख भयो भारी भक्ति रीति कछु न्यारियै! जानीऊँ न जाति जाति-पाँति को विचार कहा, अहो! रससागर सो सदा उर धारिये।। हरिगुन गाय साखी सन्तन बताय दिये, बालक जिवाय लागी ठौर वह प्यारियै। संग के पठाय दिये रहे वे जे भींजे हिये, बोले आप ‘जाऊँ जौ न मारिकेँ बिडारियै’।।२०७।।