श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८) (श्री भक्तमाल दूसरी बाईजी सुनौ चित्तलाई बात दूसरी सुहाई हिये,जिये जग मांहि जौलौं सन्त संग कीजियै। भक्त नृप एक सुता ब्याही सो अभक्त महा, जाके घर माँझ जन नाम नहीं लीजियै।। पल्यो साधु सीथ सौं सरीर दृग रूप पले, जीभ चरनामृत के स्वाद ही सौं भीजियै। रह्यौ कैसैं जाय अकुलाय न बसाय कछु, आवैं पुर प्यारे तब विष सुत दीजियै।। २०८ ।। आये पुर सन्त आइ दासी ने जनाइ कही, कही कैसे जाइ सुत विष लैकेँ दियो है। गये वाके प्रान रोय उठी किलकानि सब, भूमि गिरे आनि टूक भयो जात हियो है।। बोली अकुलाय 'एक जीवै कौ उपाय जोपै, कियो जाय पिता मेरे कैयो बार कियो है'। 'कहै साईं करें' दृग भरैं 'ल्यावौ सन्तनि कौ कैसे होत सन्त?' पूछयो चेरी नाम लियो है।।२७९।। चली लै लिवाय चेरी बोलिवौ सिखाय दियो, देखिकै धरनि परि पाँय गहि लीजियै। कीनी वही रीति दृगधारा मानौ प्रीति सन्त, करी यों प्रतीति गृह पावन कौ कीजियै।। चले सुख पाय दासी आगे ही जनाय जाय, आय ठाड़ी पौरि पाँय गहे मति भीजियै। कही हरे बात 'मेरे जानौ पिता मात मैं तो, अंग में न माति आज प्रान वारि दीजियै।। २१०।। रीझि गये सन्त प्रीति देखिकैं अनन्त कह्यो, 'होइगी जु वही सो प्रतिज्ञा तैं जो करी है। बालक निहारि जानी विष निरधार दियो, दियो चरनामृत कौं प्रानसंज्ञा धरी है।। देखत विमुख जाय पाँय ततकाल लिये, किये तब शिष्य साधुसेवा मति हरी है। ऐसें भूप नारि पति राखी सब साखी जन, रहै अभिलाखी जोपै देखौ याही घरी है।। २११।। मास परायणं नवाँ विश्राम आशै अगाध दुहुँ भक्त को, हरितोषण अतिशै कियौ।। रंगनाथ को सदन करन बहु बुद्धि विचारी। कपट धर्म रचि जैन, द्रव्यहित देह बिसारी।। हंस पकरनैं काज, बधिक बानौं धरि आये। तिलक दाम की सकुच, जानि तिन आप बँधाये।। सुत बध हरिजन देखिकै, दै कन्या आदर दियौ। आशै अगाध दुहुँ भक्त को, हरितोषण अतिशै कियौ।।५१।। मामा-भानजा आशय अगाध दोऊ भक्त मामा-भानजे कौं, दियौ प्रभु तोष ताकी बात चित धारियै। घर तें निकसि चले वन कौं विवेक रूप, मूरति अनूप बिन मन्दिर निहारियै।।