भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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६०) (श्री भक्तमाल श्रीसदाव्रतीजी महाजन महाजन सुनो सदाव्रती ताको भक्तपन, मन में विचार सेवा कीजै चित लायकै। आवत अनेक साधु, निपट अगाध मति, साधि लेत जैसी आवै सुबुधि मिलायकै।। सन्त सुख मानि, रहि गयो घर माँझ सदा, सुत सौं सनेह नित खेलै संग जायकै। इच्छा भगवान मुख्य, गौन लोभ जानि मारि, डार्यो, धूरि गाड़ि, गृह आयो पछितायकै ।।२१६.।। देखै महतारी, मग बेटा कहाँ पगि रह्यौ? बीते चारि जाम, तऊ धाम में न आयौ है। फेरी पुर दौंड़ी, ताके संग सन्त लौंड़ी आय, कह्यौ यों पुकारि, सुत कौने बिरमायौ है।। वेगि दै बताय दीजै, आभरन दिये लीजै, कही सो संन्यासी, एही मार्यौ मन लायौ है। दई लै दिखाय देह, बोल्यो याको गहि लेहु, याही ने हमारौ पुत्र मार्यो नीके पायौ है ।। २२० ।। बोल्यो अकुलाय, मैं तौ दियो है बताय मोंको, देहु जु छुटाय, नहीं झूठ कछु भाषियै। लेवौ मति नाम साधु, जो उपाधि मेट्यौ चाहौ, जावौ उठि और कहूँ, मानी छोरि नाषियै।। आयकै विचार कियौ, जानी सकुचायो सन्त, बोलि उठी तिया, सुता दै कैं नीके राखियै। पर्यो बधू पाँय, तेरी लीजिये बलाय, पुत्र शोक को मिटाय, और खरी अभिलाषियै ।।२२१।। बोलि लियौ सन्त, सुता कीजियै जू अंगीकार, दुख सो अपार, काहू विमुख कौं दीजियै। बोल्यौ मुरझाय, मैं तौ मार्यौ सुत हाय ! मौपै जियौहू न जाय, मेरो नाम नहीं लीजियै।। देखौ साधुताई, धरी सीस पै बुराई, जहाँ राईहूँ न दोष, कियौ मेरु सम रीझियै। दई बेटी ब्याहि, कहि मेरो उर दाह मिटै, कीजियै निबाह जग माहिं जौलौं जीजियै ।। २२२ ।। आये गुरु घर, सुनि दीजै कौन सर, बड़े सिद्ध सुखदाई, साधुसेवा लै बताई है। कह्यो सुत कहाँ?, आजू ! पायौ कही कैसी भाँति, कैसे कैं बखानै, जग मीचु लपटाई है।। प्रभु ने परीक्ष्या लई, सोई हमें आज्ञा दई, चलियै दिखावौं जहाँ देह कौं जराई है। गये वाही ठौर, सिरमौर हरि ध्यान कियो, जियो चल्यो आयो दास कीरति बढ़ाई है ।। २२३ ।। चारौ युग चतुर्भुज सदा, भक्त गिरा साँची करन।। दारुमई तरवार, सारमय रची 'भुवन' की। 'देवा' हित सितकेश, प्रतिज्ञा राखी जन की।। कमधुज के कपि चारु, चिता पर काष्ठ जु ल्याये। जैमल के जुधि माँहि, अश्व चढ़ि आपुन धाये।