श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपण्डा देवाजी) (६१ घृत सहित भैंस चौगुनी, श्रीधर संग सायक धरन। चारौ युग चतुर्भुज सदा, भक्त गिरा साँची करन।। ५२।। श्रीभुवनसिंहजी चौहान सुनौ कलिकाल बात, और है पुरान ख्यात, भुवन चौहान, जहाँ राना की दुहाई है। पट्टा युगलाख खात, सेवा अभिलाष साधु, चल्यो सो सिकार नृप संग भीर धाई है।। मृगी पाछे परे, करे टूक, हुती गाभिन यों आइ गई दया, कही 'काहे को लगाई है'। कहैं मोकौं भक्त, क्रिया करौं मैं अभक्तन की, दारु तरवार धरौं, यहै मनभाई है।। २२४।। और एक भाई, तानै देखी तरवार दारु, सक्यो न सँभार, जाय राना कौं जनाई है। नृप न प्रतीति करै, करै यह सौंह नाना, बानो प्रभु देखि, तेज बात न चलाई है।। ऐसे ही बरस एक, कहत वितीत भयो, कह्यो मोहि मारि डारौ, जोपै मैं बनाई है। करी गोठ कुण्ड जाय, पायकै प्रसाद बैठे, प्रथम निकासि आप सबनि दिखाई है।। २२५।। क्रम सौं निहारि कही, भुवन विचार कहा? कहौ चाहें दार, मुख निकसत सार है। काढ़िकै दिखाई, मानौं बिजुरी चमचमाई, आई मन माँझ, बोल्यौ याकौं मारौ भार है।। भक्त कर जोरिकै बचायौ, अजू ! मारियै क्यो? कही बात झूठ, नहीं करी करतार है। पट्टा दूनादून पावै, आवै मत मुजरा कौं, मैं ही घर आऊ, होय मेरौ निसतार है।। २२६।। श्रीचतुर्भुजजी के पण्डा श्रीदेवीजी दरसन आयो राना, रूप चतुर्भुज जू कैं, रहे प्रभु पौढ़ि हार सीस लपटाये हैं। वेगि दै उतारि कर, लैकैं गरे डारि दियो, देखि धौरौ बार, कही धौरे आये? आये हैं।। कहत तो कही गई, सही नहीं जात अब, महीपति डारै मारि, हरिपद ध्याये हैं। अहो हृषीकेश ! करौ मेरे लिये सेतकेश, लेशहूँ न भक्ति, कही किये देखौ छाये हैं।। २२७।। मानि राजा त्रास, दुखरासि सिन्धु बूड्यो हुतो, सुनिकै मिठास वानी मानौ फेरि जियो है। देखे सेत बार, जानी कृपा मो अपार करी, भरी आँखै नीर, सेवा लेश मैं न कियो है।। बड़ेई दयाल, सदा भक्त प्रतिपाल करें, मैं तो हौं अभक्त, ऐपै सकुचायो हियो है। झूठे समबन्धहू तैं, नाम लाजै मेरोई जु, तातैं सुख साजै, यह दरसाय दियो है।। २२८।। आयो भोर राना, सेत बार सो निहारि रह्यो, कह्यो केश काहू के, लै पण्डा ने लगाये हैं। ऐंचि लियौ एक तामें, खैंचिकै चढ़ाई नाक, रुधिर की धार नृप अंग छिरकाये हैं।। गिर्यो भूमि मुरछा हवै, तन की न सुधि कछू, जाग्यौ जाम बीते अपराध कोटि गाये है। यही अब दण्ड, राज बैठे सो न आवै इहाँ, अबलौंहूँ आनि मानि करै, जो सिखाये हैं।। २२६।।