श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२) (श्री भक्तमाल श्रीकामध्वजजी भये चारि भाई, करैं चाकरी वै राना जू की, तामें एक भक्त, करै वन में बसेरो है। आयकै प्रसाद पावै, फेरि उठि जाय तहीं, कहैं नेकु चलौ, तौ महीना लीजै तेरो है।। जाके हम चाकर हैं, रहत हजूर सदा, मरै तौ जरावै कौन?, वही जाको चेरो है। छूट्यो तन वन, राम आज्ञा हनुमान आये, कियो दाह, धुँआ लगे, प्रेत पार नेरो है।।२३०।। नवाह परायण तृतीय विश्राम श्रीजयमलजी मेरतै प्रथम वास, जैमल नृपति ताकौं, सेवा अनुराग, नेकु खटकौ न भावहीं। करै घरी दस, तामें कोऊ जो खबरि देत, लेत नहीं कान, और ठौर मरवावहीं।। हुतो एक भाई बैरी, भेद यह पाइ लियो, कियो आनि घेरौ माता, जाइकैं सुनावहीं। करैं हरि भली, प्रभु घोरा असवार भये, मारी फौज सब, कहैं लोग सचु पावहीं।।२३१।। देखै हाँफै घोरो, अहो ! कौन असवार भयौ? गयो आगे जबै, देख्यो वही बैरी पर्यो है। बोल्यो सुखपाय, 'अजू ! साँवरो सिपाही को हैं?' एकले ही फौज मारी मेरो मन हर्यो है।। तोही को दिखाई दई, मेरे तरसत नैन, ! बैनन सौं जानी वही स्याम प्रभु ढर्यो है। पूछिकै पठाय दियौ, वानै पन यहै लियौ, कियौ इन दुख करै भली बुरो कर्यो है।।२३२।। श्रीग्वाल भक्तजी भयो एक ग्वाल, साधुसेवा सो रँसाल करैं, परै जोई हाथ, लैकै सन्तन खवावहीं। पायो पकवान, वन मध्य गयो खाइवे कौं, आइवे की ढील, चोर भैंस सो चुरावही।। जानिकै छिपाई, बात, माता सौं बनाइ कही, दई विप्र भूखौ घृत संग फेरि आवही। दिन हो दिवारी कौ सु, उन्हि पहिरायौ हाँस, आईं घर दाम लिये राँभ कैं सुनावहीं।।।२३३।। श्रीश्रीधरस्वामीजी भागवत टीका करी श्रीधर सुजानि लेहु, गेह में रहत करैं जगत् व्यवहार हैं। चले जात मग, ठग लगे कहैं कौन संग? संग रघुनाथ मेरो जीवन अधार है।। जानी इन कोऊ, नाहिं मारिवो उपाय करे, धरे चाप बान, आवैं वही सुकुमार है। आये घर ल्याये पूछैं, श्याम सो सरूप कँहा? जाने वे तौ पार किये आपु डार्यो भार है।।२३४।। मास परायण दसवा विश्राम भक्तनि संग भगवान् नित ज्यौं गऊबच्छ गोहन फिरैं।। निहकिंचन इक दास तासु के हरिजन आये। विदित बटोही रूप भये हरि आपु लुटाये।।