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श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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श्री पीताम्बरा पीठ दतिया ( मध्य प्रदेश ) प्रकाशकीय अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥ श्री गुरु गीता के इस श्लोक के संबंध में पूज्यपाद श्री स्वामी जी से एक शिष्य ने पूछा - महाराज जी यह अखंड मंडलाकार से क्या तात्पर्य है। महाराज जी ने कहा आप कहीं मार्ग में जा रहे हैं आगे चल कर आपको दो रास्ते मिलते हैं आप भ्रम में पड़ जाते हैं कि किस मार्ग से जायें जिससे गन्तव्य तक पहुंच जायें। इतने में ही एक राहगीर निकलता है आप उससे अपने गन्तव्य को बता कर उससे मार्ग पूछते हैं वह आपको मार्ग बता देता है। आप उस मार्ग से चल देते हैं और गन्तव्य तक पहुंच जाते हैं। यदि आप भ्रम में पड़कर दूसरे मार्ग चले जाते तो गन्तव्य तक नहीं पहुंच पाते। यही अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् अर्थात गुरु तत्त्व सब में समाया हुआ है। केवल श्रद्धा, विश्वास की जरूरत है। श्री गुरु गीता-गुरु की महत्ता, गुरु की आज्ञा, गुरु की सेवा, और ( 9 )