श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ ध्यानम् हंसाभ्यां परिवृत्तपत्रकमलैर्दिव्यैर्जगत्कारणै विश्वोत्कीर्णमनेकदेहनिलयैः स्वच्छन्दमात्मेच्छया॥ तद्योतं पदशांभवं तु चरणं दीपांकुरग्राहिणम्। प्रत्यक्षाक्षरविग्रहं गुरुपदं ध्यायेद्विभुं शाश्वतम्॥ मम चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपेः विनियोगः। गुरुदेव का ध्यान :- ब्रह्म जीव से घिरे कमल पत्रन्त् सूक्ष्म हृदय वाले परम स्वतन्त्र अपनी रुचि के अनुसार दिव्य जगत् विश्वरूप अनेक देह वाले इस प्रपन्चात्मक जगत् को परिभाषित करने वाले शिव स्वरूप वाले जगत् कारण को प्रकाशित करने वाले नित्य व्यापक प्रत्यक्ष अक्षर आकार ब्रह्म गुरु स्वरूप का हम ध्यान करते हैं। ऋषिरुवाचः गुह्याद्गुह्यतरा विद्या गुरुगीता विशेषतः। त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्यं तत्सर्वं ब्रूहि सूत मे ॥१॥ ऋषिराज कथन :- नैमिषारण्य की पावन धरती पर विराजमान ८८००० शौनकादि ऋषि जो कि सुबह सत्र में हवन पूजन और सायं स्तव में कथा रसपान करने के क्रम मे प्रश्न किया - कि हे श्रीमान् ! हे भगवन् ! आप हमें परम गोपनीय रहस्यमय गुरुगीता का उपदेश दीजिये मैं विस्तार से उसे पूरा-पूरा सुनना चाहता हूं ०१ ( 16 )