भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

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अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये न देहे मनो वर्त्तते मे त्वनर्घ्ये। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥८॥ वीरान जंगल में, किंवा घर में या फिर किसी कार्य में मन नहीं लगता हो। अर्थात् अमूल्य गुरु चरण का ध्यान ही सर्वोपरि है उनके ध्यान के बिना सब व्यर्थ है, ध्यान के बिना सब व्यर्थ है, ध्यान के बिना सब व्यर्थ है। ध्यान के बिना सब व्यर्थ है। आगे और है ही क्या ॥८॥

अनर्घ्याणि रत्नानि मुक्तानि सम्यक्-समालिङ्गिता कामिनी यामिनीषु। गुरोरंधिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥९॥ अमूल्य रत्नों का उपयोग जीवन में किया। सुर सुन्दरियों में विषयासक्त हो के रात्रि बिता दी। यदि गुरु चरण कमलों में मन नहीं लगा तो ये सभी निरर्थक हुये। गुरु चरण ध्यान मनन ही सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोत्कृष्ट है। इसके आगे और कुछ है ही नहीं॥९॥

गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही। लभेद्व वांछितार्थं पदं ब्रह्मसंज्ञं, गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥१०॥ यह जो पुण्यात्मा गुर्वष्टक मन लगा के पढ़े। चाहे वे यति हो या भूपति हो, गृहस्थ हो ब्रह्मचारी हो, वह वांछित ब्रह्मपद को पाता है, यदि वह गुरु वाक्य में विश्वास कर उनके अनुसार चलता है॥१०॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं गुरोरष्टकं सम्पूर्णम्॥

( 58 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal