श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥४॥ विदेशों में मान्यता, अपने देश में धन्यवाद के पात्र होना, सदाचार चर्चा में प्रमत्त होना ये सब बिना गुरु चरण कमल के ध्यान के सभी निरर्थक हैं। अर्थात्। शांति दायक नहीं है। नहीं है। नहीं है। नहीं है॥४॥
क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥५॥ पृथ्वी मण्डल पर सभी राजाओं से जिनके चरण कमल सदा सुपूजित हैं ऐसे वैभव से क्या प्रयोजन है, कुछ नहीं। गुरु चरण कमल युगल में मन नहीं लगा तो उससे आगे कुछ भी नहीं। अर्थात् गुरु चरण युग्म का ध्यान सर्वोपरि है, ध्यान सर्वोपरि है, ध्यान सर्वोपरि है, ध्यान सर्वोपरि है॥५॥
यशो से गतं दिक्षु दानाप्रतापा-ज्जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥६॥ दान के प्रभाव से हमारा यश देश-विदेश में फैल गया हो तथा जिनके प्रसाद से संसार की हर वस्तु मिल गई हो, यदि गुरु चरणों में हमारा मन नहीं लगा तो सब व्यर्थ ही है। सब व्यर्थ ही है। सब व्यर्थ ही है। सब व्यर्थ ही है॥६॥
न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ, न कान्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥७॥ न भोग, न योग, न हाथी, घोड़े की सवारी न चन्द्र वदनी के मुख और धन इनमें चित्त नहीं हैं ऐसा विराग भी बेमानी है। अर्थात् बिना गुरु चरण कमलों के ध्यान के इससे परे और है ही क्या ? गुरु पद कमलों के ध्यान से ही सार्थकता है, सार्थकता है, सार्थकता है, सार्थकता है॥७॥ ( 57 )