भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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॥ गुर्वष्टकम् ॥ गुरुवृत्य अनुरोधनं, न किंचिदपि तस्य दुर्लभम्। शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥१॥ सुरूपवान पुष्ट शरीर हो, उसी प्रकार की सुंदर स्त्री हो, वैभव हो अर्थात् विचित्र वैभव सुमेरु राशि तुल्य धन ये सब कुछ भी हो यदि श्री सद्गुरु के चरण कमल में मन नहीं लगा तो उससे आगे और है ही क्या। अर्थात् यदि गुरु कृपा है तो ये सभी सार्थक है वर्ना निरर्थक है, निरर्थक है, निरर्थक है, निरर्थक है॥१॥ कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्॥ गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं, ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥२॥ स्त्री, पुत्र, पौत्र, घर, मकान, भाई, बंधु सभी उपलब्ध हुये। ये तभी सार्थक हैं, जब गुरु चरण कमल में ध्यान लगा रहे। नहीं ये सभी निरर्थक, निरर्थक, निरर्थक, निरर्थक। अर्थात्-गुरु चरण ध्यान के अलावा कुछ है ही नहीं॥२॥ षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं, ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥३॥ छै अंगों सहित वेदाध्ययन सुख, शास्त्र विद्या, गद्य-पद्य मय कवित्व करना ये सभी गुरु चरण ध्यान के बिना निःस्सार हैं, निःस्सार हैं, निःस्सार हैं, निःस्सार हैं। अतः इन सब आडंबरों से होना जाना कुछ नहीं॥३॥ ( 56 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal