श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको) विह्वल होकर अन्तर तल हृदय स्थली से सस्वर मुक्त कण्ठ से गान करें तो वे सदपात्र बिना पुरूश्चरण किये ही पराम्बा की कृपा पाकर कृतकृत्य हो जाते हैं तथा निर्विघ्नता पूर्वक नित्य ही आराधना पूजा का मंगलदायी सुफल पाते हैं और अन्त समय परम पद मोक्ष को प्राप्त होते हैं जो पद योगियों के लिये भी दुर्लभ हैं॥९॥ इति श्री वामकेश्वरतन्त्रे पार्वतीशिवसंवादे श्रीगुरुस्तवराजः सम्पूर्णः। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शित येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति। द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्॥ एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्। भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूंतं नमामि॥ जिनकी कृपा कोर पाने से-चितचेतन होते उत्कर्ष। आरत शरणागत, चरणों में ले लो मेरे सद्गुरूदेव समर्थ॥ ( 55 )