श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 82 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैते यस्य तुलां व्रजन्ति कलया कारुण्यवारांनिधेः॥ स्तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥७॥ इंद्रादिक, विष्णुदेव, महादेव, अम्बिका माता-पिता, अतिथि, अभ्यागत, आचार्य कुलगुरु, श्रेष्ठ यतीजती, विद्या वृन्द, तपोनिष्ठ भिक्षुक इन सबकी कलायें, उन सद्गुरु करुणा सागर की अनुग्रहीत किंचित कृपा की तुलना में नगण्य हैं। ऐसे शिव स्वरूप समर्थ सद्गुरु समस्त सिद्धियों के प्रदाता की वन्दना करता हूँ॥७॥ ध्यानं दैवतपूजनं गुरुतपोदानाग्निहोत्रादयः॥ पाठो होमनिषेवणं पितृमखाह्याभ्यागतार्च्चा वलिः॥ एते व्यर्थफलां भवन्ति सततं यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥८॥ ध्यान, देव पूजन, महान तप, दान, श्राद्ध, हवन आदिक कर्म व्रतोपवास पाठ अभ्यागत अतिथि का विधिवत पूजागत सत्कर्म जिनकी कृपा के बिना सुफलदायी नहीं होते ऐसे शिव स्वरूप अपने समर्थ सद्गुरु की मैं वन्दना करता हूँ॥८॥ पूर्वाशाभिमुखः कृताञ्जलिपुटः श्लोकाष्टकं यः पठेत्॥ पौरश्चर्यविधिं विनाऽपि लभते मन्त्रस्य सिद्धि पराम्॥ नो विघ्नैः परिभूयते प्रतिदिनं प्राप्नोति पूजाफलम्॥ देहान्ते परमं पदं निविशते यद्योगिनां दुर्लभम्॥९॥ पूर्व दिशा की ओर आमुख होकर प्रातः काल विनम्र श्रद्धावनत होकर युगल कर-वंदना से भाव विभोर होते हुए उपरोक्त आठों पदों (श्लोकों ( 54 )