भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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नहीं है। ऐसे शिव स्वरूप सद्गुरु सर्व सिद्धि देने वाले अपने गुरु की वंदना करता हूँ॥४॥ रेवासिन्धुसरस्वती त्रिपथगाः सूर्यात्मजा कौशिकी॥ गङ्गासागरसङ्गमोऽद्रितनया लौहित्यशोणादयः॥ नालं प्रोक्तफलप्रदानविषये यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥५॥ रेवा, सिन्धु, सरस्वती, गंगा-जमुना, कौशिकी, गंगासागर, संगमोदितनया (लोहित्य) शोणभद्रादिक ये सभी जिनकी कृपा के बिना इच्छित फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं। ऐसे शिव-स्वरूप समस्त सिद्धियों के प्रदाता अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥५॥ सत्कीर्ति विमलं यशः सुकविता पाण्डित्यमारोग्यता॥ वादे वाक्पटुता कुले चतुरता गाम्भीर्यमक्षोभ्यता॥ प्रागल्भ्यं प्रभुता गुणे निपुणता यस्य प्रसादाद् भवेत्॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिपदम्॥६॥ सुन्दर कीर्ति, विमल यश, अच्छी कविता, विद्वता, निरोगता, शास्त्रार्थ में निपुणता, कुल में चतुरता, समर्थता धैर्यशीलता, गम्भीरता, तेजस्विता ऐश्वर्यवान, गुणों में निपुणता ये समस्त गुण उन गुरुवर की करुण कृपा से ही परिपूर्णता पाते हैं जो समस्त सिद्धियों को देने वाले हैं ऐसे शिव स्वरूप अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥६॥ लोकेशो हरिरम्बिका स्मरहरो मातापिताऽभ्यागता॥ आचार्य्यः कुलपूजितो यतिवरो वृद्धस्तथा भिक्षुकः॥ ( 53 )