श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 82 में से
संदर्भ में पढ़ेंमद मोहरूप अंधकार से ग्रसित मनुष्यों के नेत्रों को अपनी इच्छा से दया करके ज्ञान अंजन से खोलकर जिसने दिव्य अन्तर्चक्षु देकर रुचिर बना दिया है उनकी तेजोमयी कान्ति प्रभा तीनों लोक (तल, अतल, तलातल) में व्याप्त हो रही है। तत्त्व का ज्ञान बोध कराने वाले, समस्त सिद्धियों के प्रदाता शिव स्वरूप अपने सद्गुरू की वंदना करता हूँ॥२॥ मातंगी भुवनेश्वरी च बगला धूमावती भैरवी॥ तारा छिन्नशिरोधरा भगवती श्यामा रमा सुन्दरी॥ दातुं न प्रभवन्ति वाञ्छितफलं यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थ सिद्धिप्रदम्॥३॥ मातंगी, भुवनेश्वरी, बगला, धूमावती, भैरवी, तारा, छिन्नमस्ता, भगवती काली, लक्ष्मी त्रिभुवन सुन्दरी, जिस गुरु के प्रसन्न हुये बिना इच्छित फल नहीं दे सकती ऐसे शिव स्वरूप सर्व सिद्धि प्रदायक अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥३॥ काशीद्वारवती प्रयाग मथुरा-ऽयोध्या गयाऽवन्तिका॥ माया पुष्कर-काञ्चिकोत्कलगिरिः श्री शैलविन्ध्यादयः॥ नैते तारयितुं भवन्ति कुशला यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥४॥ काशी, द्वारवती, प्रयाग, मथुरा, अयोध्या, गया, अवंतिका (उज्जैन), माया, पुष्कर, कांची (शिव कांची) उत्कृष्ट उड़ीसा श्रीशैल विंध्याचल ये सभी शिव समान गुरु की कृपा के बिना तरन तारण करने में समर्थ ( 52 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal