श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ गुरुस्तवराजः ॥ ॥ गुंगुरुभ्यो नमः ॥ श्री गणेशाय नमः। ॥ श्री गुरुस्तवराजः प्रारभ्यते सर्वाऽभीष्टसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः॥ शरदचंद्र के समान श्वेत कमल जैसे नेत्र किंचित मुस्कराते हुये, शरद के पूर्ण चन्द्रमा के समान उद्दीत्यमान मुख, दिव्य विशाल नेत्र, श्वेत वस्त्र, चंदन को धारण किये हुए, अरूण आभा, वामांग में स्वप्रकाशित मनोहर शक्ति को बिठाए हुए, बर अभय मुद्रा धारण किये, समस्त सुलक्षणों सहित ऐसे सद्गुरु को अपने सिर में सहस्रदल कमल के मध्य ध्यान करें। ब्रह्मस्थानसरोजमध्यविलसच्छीतांशु पीठस्थितम्॥ स्फूर्जत्सूर्यरुचिं वराभयकरं कर्पूरकुन्दोज्ज्वलम्॥ श्वेतस्रग्वसनानूलेपनयुतं विद्युद्रुचा कान्तया॥ संश्लिष्टार्द्धतनुं प्रसन्नवदनं वन्दे गुरुं सादरम्॥१॥ सहस्रदल कमल में स्थित चंद्रपीठ में बैठे हुए जाज्वल्य सूर्य के समान प्रकाशित वर अभय मुद्रा धारण किये हुए, कर्पूर कुन्द के समान आभा, श्वेत पुष्प माला धारण श्वेत वस्त्र और चन्दन लेपन-बिजली के समान कांति वाली मातृ शक्ति के साथ सद्गुरु की आदर सहित वन्दना करता हूँ॥१॥ मोहध्वान्तमदान्धताग्रहवतां चक्षूंषिचोन्मीलयन्॥ यश्चक्ररुचिराणि तानि दयया ज्ञानाञ्जनाभ्यञ्जनैः॥ व्याप्तं यन्महसा जगत्त्रयमिदं तत्त्वबोधोदये॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥२॥ ( 51 )