भारतकोश
श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान

श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान

Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan

राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा

स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished32 पृष्ठ

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चलूंगा लक्ष्मण की जो मां हैं (सुमित्रा), वो बार-बार यह सिखा रही है कि तुम्हें राम की छाया बन के रहना जीवन के किसी भी मोड़ पर उन्हें छोड़ना नहीं, तुमको उनसे सीखना है अपना ही ईष्ट उनको बनाना है, तो सुमित्रा की शिक्षा बाद में दशरथ का आशीर्वाद दोनों मिलकर विश्वामित्र के साथ जाते हैं, विश्वामित्र के साथ जब वो जा रहे हैं तो सबसे महत्व की बात जो मुझे समझ में आती है वह यह कि जब उनको कहा उनके पिता श्री दशरथ देखो राक्षसों से युद्ध होगा तुम अपनी सेना लेकर जाओ तो श्री राम कहते हैं कि सेना लेकर गया तो क्या फायदा? तो कहते हैं अच्छा ठीक है सेना लेकर नहीं जा रहे हो तो अस्त्र-शस्त्र लेकर जाओ, तो उन्होंने कहा अयोध्या के अस्त्रों से लड़ा तो क्या फायदा? फिर वह कह रहे हैं कि अच्छा ठीक है ना तुम सेना ले जाना चाहते हो, ना अस्त्र-शस्त्र ले जाना चाहते हो, इस राज्य के कुछ बहादुर सैनिक हैं उनको अपने साथ ले जाओ, उन्होंने कहा “नहीं” यह तो मैं धर्म युद्ध के लिए जा रहा हूँ न्याय युद्ध के लिए जा रहा हूँ इसलिए जहां जाऊंगा वहीं सेना बनाऊंगा, जहां जाऊंगा वहीं अस्त्र शस्त्रों का निर्माण करूंगा, जहां जाऊंगा वहीं संसाधन जुटाऊंगा। अब ये जो बात है श्री राम जी की यह आज की बहुत सारी समस्याओं की तरफ इशारा करती है। श्रीराम में लीडरशिप है, नेतृत्व करने की क्षमता है। लीडर वह होता है जो जहां जाये वही व्यवस्था बनाए, और आज के भारत की राजनीति में लीडर पैदा होना बंद हो गए हैं अब मैनेजर पैदा होते हैं, मैनेजर माने वह जिसको सब कुछ दिया जाए तब कुछ करें। हमारे आज के नेता पता क्या कहते हैं? टी.ए. चाहिए, डी.ए. चाहिए, एच.आर.ए. चाहिए, बेसिक सैलरी चाहिए, इतने करोड़ रुपये का खर्चा चाहिए, ऐ.सी. गाड़ियां चाहिए, ऐ.सी फस्ट क्लास का पास चाहिए, हवाई जहाज की नियमित यात्राएं चाहिए, तब जाकर हम करेंगे, तो ये लीडर नहीं हैं, मैनेजर हैं। क्योंकि किसी कंपनी में हम मैनेजर को नियुक्त करते हैं तो उसके लिए सब सुविधाएं जुटा कर देते हैं एक ऐसी चेंबर होता है, गाड़ी होती है, टेलीफोन होता है, मोबाइल फोन होता है, सब कुछ होता है, सुविधाएं जुटा कर हम देते हैं तब वो काम करता है वह मैनेजर होता है, और बिना सुविधाओं के काम करके जो बना लेता है वो लीडर होता है। श्रीराम में लीडरशिप है, और उन्हें भरोसा है कि वह कह रहे हैं कि मैं वन में चला गया, आप परेशान मत हो जो वन में रहने वाले लोग हैं उन्हीं के बीच से सेना खड़ी करूंगा, उनके पास जो संसाधन हैं, उन्हीं से अपने काम चला लूंगा, आयोध्या की सेना माँगने के लिए नही आऊंगा, हाँ जरूरत पड़ेगी, तो विश्वामित्र जी से युद्ध में निर्देश लेता रहूंगा, लेकिन माँगने तो नहीं आऊंगा। उनका अपना आत्मविश्वास इतने गजब का है, वो लक्ष्मण को पूछते हैं तुम्हें मंजूर है हम बिना सेना के जा रहे हैं, बिना दास दासियों के जा रहे हैं बिना संसाधनों के जा रहे हैं, हम अपना रथ भी लेकर नहीं जा रहे हैं, रथ भी यही छोड़ेंगे, अयोध्या की सीमा खत्म हो जाएगी उसके बाद रथ आगे नहीं जाएगा, पैदल ही जाना पड़ेगा जैसे विश्वामित्र कहेंगे वैसे ही करना पड़ेगा, कंदमूल खाने पड़ेंगे, जंगलों में सोना पड़ेगा, पेड़ के नीचे कुटिया बनानी पड़ेगी, हो सकता है कि बहुत सारे कीड़े-मकोड़े हमें परेशान करें उनके बीच में सुरक्षित रहना पड़ेगा, तैयार हो?

लक्ष्मण – “इसमें पूछने की क्या बात है?” तो श्री राम कह रहे हैं कि अभी तक तुमने दुख देखा नहीं है, अभी तो राज महल के सुख में तुम रहे हो , तो वह पूछ रहे हैं लक्ष्मण।