श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान
Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan
राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा
स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऊंचाई है तो जब विश्वामित्र आते हैं और राम जी को मांगते हैं तो दशरथ कहते हैं कि ठीक है मैं वशिष्ठ से बात करूंगा और मेरे गुरु अगर कहते हैं तो जरूर शहर जाने की अनुमति है, तो वशिष्ठ से दशरथ जी का संवाद होता है उस संवाद में श्री राम जी भी पहुंच जाते हैं हालांकि उनको उनके पिता ने अनुमति नहीं दी है कि तुम इसमें शामिल हो लेकिन वह कहते हैं कि मेरे बारे में फैसला हो रहा है इसलिए मेरा रहना आवश्यक है तो वशिष्ठ जी कुछ ऐसे इशारे में संकेत करते हैं कि राम का वहां जाना ठीक नहीं है उसकी जरूरत भी नहीं है हम चाहे तो विश्वामित्र के साथ अपनी सेना को भेज देते हैं, यह सेना जाएगी राक्षसों का संहार करके वापस आ जायेगी , इसमें कोई तकलीफ नहीं है, तो श्री राम पूछ रहे हैं आप ऐसा क्यों सोचते हैं, तो वशिष्ठ कहते हैं देखो, तुम्हारे पिताजी वृद्ध हो चुके हैं इनको अभी वानप्रस्थी होना है, राजकाज से मुक्त होना है अब तुम्हें इस राज्य को संभालना है तुम्हें यह पद मिलना है इस पर बैठकर इस की गरिमा है, इसकी इज्जत है, प्रतिष्ठा है, वह बढ़ानी है, इसलिए हम तुमको वन नहीं भेज सकते पता नहीं वहां कितना समय लगे दो वर्ष लग जाये, 5 वर्ष लग जाए, हो सकता है ज्यादा समय लग जाए, क्योंकि यह राक्षसों का साम्राज्य खास कर जो मायावी राक्षस हैं उनका साम्राज्य बहुत फैल गया है अयोध्या की सीमा को छोड़कर जितनी सीमाएं वर्णन की गई है वह सब राक्षसों के कब्जे में हैं, तो श्री राम कह रहे हैं कि जीवन में एक ही तो मौका मिल रहा है अपने को साबित करने का और आप वह भी मुझसे छीन लेना चाहते और वह कहते हैं कि मुझे तो लगता है कि विश्वामित्र मेरे बड़े हितैषी हैं आप की तुलना में । तो वशिष्ठ उनसे पूछ रहे हैं कि तुमको ऐसा क्यों लगता है? तो वह कहते हैं कि देखो जब तक मैं राज महल में रहता हूँ तो मुझे प्रजा के सुख-दुख का सिर्फ अनुभव हो जाए इसकी मैं कोशिश करता हूँ प्रयास पूर्वक । लेकिन अगर मैं राज महल छोड़कर चला जाऊं और जंगल में रहने लगे ऐसे ही जैसे सामान्य प्रजा रहती है तो मुझे प्रयास पूर्वक अनुभव नहीं करना पड़ेगा, आसानी से मुझे अनुभव होने लगेगा, जब तक मैं राजमहल के सुख नहीं छोड़ूंगा, तब तक मुझे दुख का अनुभव नहीं होगा और जब तक दुख का अनुभव नहीं होगा तब तक न्याय और अन्याय का अंतर मुझे नहीं पता होगा, क्या अभीष्ट है क्या नहीं है यह मैं समझ नहीं पाऊंगा इसलिए मुझे तो जाना ही है अब इस तरह के वाक्य बोलते हैं तो वशिष्ठ बोलते हैं, फिर ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा तो श्री राम जी कहते हैं, मेरी इच्छा नहीं, ईश्वर की इच्छा , तो वशिष्ठ कहते हैं, कि कैसे?
श्री राम कहते हैं कि, ये ईश्वर की इच्छा है कि मैं जाऊं वरना विश्वामित्र ऐसे ही नहीं आये हैं, विश्वामित्र खुद इतने तपस्वी हैं, बलशाली हैं, जिन्होंने अद्भुत अस्त्यों-शस्त्रों का निर्माण किया है , वह चाहे तो राक्षसों का पूरा साम्राज्य मिटा सकते वह कह रहे हैं वे कह रहे हैं कि मैंने सकल्प लिया है कि मैं राक्षसों के युद्ध नहीं लड़ूंगा, लेकिन वे सकल्प तोड़ भी सकते हैं, लेकिन कुछ विशेष सोच विचार कर वे मुझे लेने आये हैं तो मैं मानता हूँ ये ईश्वर की कोई इच्छा है और वशिष्ठ को कहते हैं कि मैं तो बहुत आस्थावान हूँ, ईश्वर के प्रति मेरा परम विश्वास है, इसलिए मुझ लगता है कि वनगमन जाना ही है तो वो निकलते हैं और अपने साथ अपने भाई लक्ष्मण को ले जाते हैं पहले तो वह सोचते हैं मैं अकेला जाऊं लेकिन लक्ष्मण उनको बहुत ज़िद करके तैयार करते हैं, नहीं मैं भी आपके साथ