श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान
Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan
राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा
स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकहते हैं कि तुम्हें ब्रह्म मुहूर्त में उठना है और प्रजा के बीच में जाकर घुमना है, प्रजा के मन के सुख दुख तुम्हें पता करने हैं, ये आकर मुझे या मंत्रिमंडल के सामने रखने हैं, तो भगवान श्री राम या राजकुमार श्री राम बिना किसी तकलीफ के बिना किसी दुख को महसूस किए हुए या बिना किसी रूकावट के हर दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं, दैनिक कर्म से निर्वृत होते हैं और प्रजा के बीच में घूमते हैं प्रजा से हालचाल पूछते हैं लोगों से बात करते हैं आप क्या महसूस करते हैं? राज्य कैसा चल रहा है? नीतियां कैसी है? राजा के बारे में राजा के राज्य के अधिकारियों के बारे में नियमित रूप से वह फीडबैक लेते हैं जानकारी लेते हैं, लौटकर आकर दरबार में अपने पिता श्री दशरथ को बताते हैं यह देखो इस प्रश्न पर प्रजा ऐसा सोचती है उस प्रश्न पर ऐसे सोचती है, और दशरथ श्रीराम की दी गई सूचनाओं के अनुसार बहुत सारे फैसले करते हैं कोई नीति बदलनी है तो नीतियों को बदलते हैं, राज्य के किसी अधिकारी को दंड देते है, और दशरथ जी का ऐसा मानना है कि राम झूठ नहीं बोलता क्योंकि उसमें बहुत सारे सट्टे हैं उनमें से एक सट्टा है कि उसके मुंह से झूठ बात कभी निकलती नहीं वह झूठ कभी बोलता नहीं सत्य का आचरण हमेशा रखता है, और उसे कभी छोड़ता नहीं, तो वह जैसा भी आकर भगवान राम उनको बताते हैं दशरथ जी उनको पूरा का पूरा मान कर के अक्षर से सच है वैसे ही न्याय करते हैं, तो उनका राज्य बहुत अच्छे से चल रहा है, प्रजा में काफी सुख है, दुख नहीं है, तकलीफ नहीं है, तो श्री राम जी के 14 वर्ष के आसपास की उम्र का समय इस कार्य में बीत रहा है माने दशरथ जी के मन में यह अपेक्षा हो रही है कि एक दिन आकर ये अच्छे से गद्दी संभाल लेगा और यह अच्छा राजा सिद्ध होगा और राम जी भी अपना कर्तव्य मानकर उसको नियमित रूप से कर रहे हैं, जब-जब उनके सामने ऐसा कोई मौका आता है की जाओ अपने निहाल चले जाओ, या अपने किसी रिश्तेदार के घर चले जाओ, तो किसी न किसी कारण से अपने को रोकते हैं और वह बार-बार कहते कि मैं निहाल गया तो यह बड़ा काम रुक जाएगा। इसलिए निहाल जाना हर बार टालते हैं, जबकि उनके दो भाई हैं भरत, उनको जब मौका मिले निहाल जाने का वह सहर्ष तैयार रहते हैं और उनकी मां भी उनको बहुत प्रेरित करती है कि तुम ज्यादा समय वहीं रहो तो अच्छा है तो ऐसा कुछ अंतर सा दिखाई देता है। बाद में उनके इसी उम्र के आसपास के समय में उस राज्य के एक बड़े गुरु विश्वामित्र जी आकर श्री राम को उनके पिता से मांग लेते हैं, और वह कहते हैं कि देखो वन में यज्ञ करना चाहता हूँ और यज्ञ करने के लिए रास्ते में बहुत सारी रुकावटें हैं उन रुकावटों में सबसे बड़ी रुकावट है राक्षस , वे यज्ञ संपन्न नहीं होने देते किसी न किसी कारण कोई न कोई विघ्न डालते रहते हैं, मैं शस्त्र नहीं उठाने की कसम खा चुका हूँ वरना मैं स्वयं इन राक्षसों का संहार करने में समर्थ तो मुझे आप अपना बेटा दीजिए जो इन राक्षसों का संहार करें और मेरा यज्ञ सम्पन्न करें। बाद में विश्वामित्र जी दशरथ के दरबार में आकर पूरी कहानी बताते है कि कैसा अत्याचार मचा रखा है, कैसे ये तहस-नहस करने में लगे हुए हैं, आधी-आधी आप जानते हैं कि राजा दशरथ के जो गुरु हैं वह वशिष्ठ हैं, लेकिन विश्वामित्र भी उनसे कुछ नीचे नहीं हैं, वशिष्ठ की राज दरबार में बहुत इज्जत है सम्मान है, लेकिन विश्वामित्र का समाज में बहुत सम्मान है, उस समय का जो समाज है, उस समाज में विश्वामित्र की ऊंचाई बहुत है, और राज्य के अंदर वशिष्ठ की