श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1015, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१०१३
हे प्रभो! यह अज्ञानी जीव आपकी मायाके वश होकर निरन्तर भूला फिरता है। हे कृपाके समुद्र भगवान्! उसपर क्रोध न कीजिये ॥ १०८ (ग) ॥
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल ।
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥ १०८ (घ) ॥
हे दीनोंपर दया करनेवाले [कल्याणकारी] शङ्कर! अब इसपर कृपालु होइये (कृपा कीजिये), जिससे हे नाथ! थोड़े ही समयमें इसपर शापके बाद अनुग्रह (शापसे मुक्ति) हो जाय ॥ १०८ (घ) ॥
एहि कर होइ परम कल्याना । सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥ बिप्र गिरा सुनि परहित सानी । एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥
हे कृपानिधान! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरेके हितसे सनी हुई ब्राह्मणकी वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई—‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) ॥ १ ॥
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा । मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा ॥ तदपि तुम्हारि साधुता देखी । करहिउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥
यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध करके शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा ॥ २ ॥
छमासील जे पर उपकारी । ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥ मोर श्राप द्विज व्यर्थ न जाइहि । जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥
हे द्विज! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्रीरामचन्द्रजी। हे द्विज! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा। यह हजार जन्म अवश्य पावेगा ॥ ३ ॥
जनमत मरत दुसह दुख होई । एहि स्वल्पउ नहिं व्यापिहि सोई ॥ कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना । सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥
परन्तु जन्मने और मरनेमें जो दुःसह दुःख होता है, इसको वह दुःख जरा भी न व्यापेगा और किसी भी जन्ममें इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। हे शूद्र! मेरा प्रामाणिक (सत्य) वचन सुन ॥ ४ ॥
रघुपति पुरीं जन्म तव भयऊ । पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥ पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें । राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥
[प्रथम तो] तेरा जन्म श्रीरघुनाथजीकी पुरीमें हुआ। फिर तूने मेरी सेवामें मन लगाया। पुरीके प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न होगी ॥ ५ ॥
सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥ अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेसु संत अनंत समाना ॥