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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1016, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1016

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  • रामचरितमानस *

हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन। द्विजोंकी सेवा ही भगवान्को प्रसन्न करनेवाला व्रत है। अब कभी ब्राह्मणका अपमान न करना। संतोंको अनन्त श्रीभगवान्हीके समान जानना ॥६॥

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला । कालदंड हरि चक्र कराला ॥ जो इन्ह कर मारा नहीं मरई । बिप्र द्रोह पावक सो जरई ॥

इन्द्रके वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, कालके दण्ड और श्रीहरिके विकराल चक्रके मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रदोहरूपी अग्निसे भस्म हो जाता है ॥७॥

अस बिबेक राखेहु मन माहीं । तुम्ह कहैं जग दुर्लभ कछु नाहीं । औरउ एक आसिषा मोरी । अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥

ऐसा विवेक मनमें रखना। फिर तुम्हारे लिये जगत्में कुछ भी दुर्लभ न होगा। मेरा एक और भी आशीर्वाद है कि तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति होगी (अर्थात् तुम जहाँ जाना चाहोगे, वहाँ बिना रोक-टोकके जा सकोगे) ॥८॥

दो०— सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि ।

मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥ १०९ ( क ) ॥

[आकाशवाणीके द्वारा] शिवजीके वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर 'ऐसा ही हो' यह कहकर मुझे बहुत समझाकर और शिवजीके चरणोंको हृदयमें रखकर अपने घर गये ॥१०९ (क)॥

प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल ।

पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गऐ कछु काल ॥ १०९ ( ख ) ॥

कालकी प्रेरणासे मैं विन्ध्याचलमें जाकर सर्प हुआ। फिर कुछ काल बीतनेपर बिना ही परिश्रम (कष्ट) के मैंने वह शरीर त्याग दिया ॥१०९ (ख)॥

जोड़ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान ।

जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥ १०९ ( ग ) ॥

हे हरिवाहन! मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है ॥१०९ (ग)॥

सिर्वे राखी श्रुति नीति अरु मैं नहीं पावा क्लेस ।

एहि बिधि धरेउँ बिबिधि तनु ग्यान न गयउ खगेस ॥ १०९ ( घ ) ॥

शिवजीने वेदकी मर्यादाकी रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया। इस प्रकार हे पक्षिराज! मैंने बहुत-से शरीर धारण किये, पर मेरा ज्ञान नहीं गया ॥१०९ (घ)॥

त्रिजग देव नर जोड़ तनु धरऊँ । तहैं तहैं राम भजन अनुसरऊँ ॥

एक सूल मोहि बिसर न काऊ । गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥