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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 1018

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  • रामचरितमानस *

छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥ राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥

मेरी तीनों प्रकारकी (पुत्रकी, धनकी और मानकी) गहरी प्रबल वासनाएँ छूट गयीं और हृदयमें एक यही लालसा अत्यन्त बढ़ गयी कि जब श्रीरामजीके चरणकमलोंके दर्शन करूँ तब अपना जन्म सफल हुआ समझूँ॥७॥

जेहि पूछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्व भूतमय अहई॥ निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई॥

जिनसे मैं पूछता, वे ही मुनि ऐसा कहते कि ईश्वर सर्वभूतमय है। यह निर्गुण मत मुझे नहीं सुहाता था। हृदयमें सगुण ब्रह्मपर प्रीति बढ़ रही थी॥८॥

दो०—गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग।

रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥ ११० ( क )॥

गुरुजीके वचनोंका स्मरण करके मेरा मन श्रीरामजीके चरणोंमें लग गया। मैं क्षण-क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त करता हुआ श्रीरघुनाथजीका यश गाता फिरता था॥११० (क)॥

मेरु सिरवर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।

देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन॥ ११० ( ख )॥

सुमेरुपर्वतके शिखरपर बड़की छायाँमें लोमश मुनि बैठे थे। उन्हें देखकर मैंने उनके चरणोंमें सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे॥११० (ख)॥

मुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज।

मोहि सादर पूछत भए द्विज आयहु केहि काज॥ ११० ( ग )॥

हे पक्षिराज! मेरे अत्यन्त नम्र और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि मुझसे आदरके साथ पूछने लगे—हे ब्राह्मण! आप किस कार्यसे यहाँ आये हैं॥११० (ग)॥

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्वग्य सुजान।

सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान॥ ११० ( घ )॥

तब मैंने कहा—हे कृपानिधि! आप सर्वज्ञ हैं और सुजान हैं। हे भगवन्! मुझे सगुण ब्रह्मकी आराधना [की प्रक्रिया] कहिये॥११० (घ)॥

तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा॥

ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी। मोहि परम अधिकारी जानी॥

तब हे पक्षिराज! मुनीश्वरने श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कुछ कथाएँ आदरसहित कहीं। फिर वे ब्रह्मज्ञानपरायण विज्ञानवान् मुनि मुझे परम अधिकारी जानकर—॥१॥