सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1019, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1019
  • उत्तरकाण्ड *

१०१७

लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वैत अगुन हृदयेसा ॥ अकल अनीह अनाम अरूपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥

ब्रह्मका उपदेश करने लगे कि वह अजन्मा है, अद्वैत है, निर्गुण है और हृदयका स्वामी (अन्तर्यामी) है। उसे कोई बुद्धिके द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित अनुभवसे जाननेयोग्य, अखण्ड और उपमारहित है, ॥ २ ॥

मन गोतीत अमल अविनासी । निर्बिंकार निरवधि सुख रासी ॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा । बारि बीचि इव गावहिं बेदा ॥

वह मन और इन्द्रियोंसे परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्बिंकार, सीमारहित और सुखकी राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है (तत्त्वमसि), जल और जलकी लहरकी भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है ॥ ३ ॥

बिबिधि भाँति मोहि मुनि समुद्गावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥ पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥

मुनिने मुझे अनेकों प्रकारसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें नहीं बैठा। मैंने फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर कहा—हे मुनीश्वर! मुझे सगुण ब्रह्मकी उपासना कहिये ॥ ४ ॥

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥ सोइ उपदेस कहहु करि दया । निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥

मेरा मन रामभक्तिरूपी जलमें मछली हो रहा है (उसीमें रम रहा है)। हे चतुर मुनीश्वर! ऐसी दशामें वह उससे अलग कैसे हो सकता है? आप दया करके मुझे वही उपदेश (उपाय) कहिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजीको अपनी आँखोंसे देख सकूँ ॥ ५ ॥

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥ मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥

[पहले] नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथको देखकर, तब निर्गुणका उपदेश सुनूँगा। मुनिने फिर अनुपम हरिकथा कहकर, सगुण मतका खण्डन करके निर्गुणका निरूपण किया ॥ ६ ॥

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥ उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा ॥

तब मैं निर्गुण मतको हटाकर (काटकर) बहुत हठ करके सगुणका निरूपण करने लगा। मैंने उत्तर-प्रत्युत्तर किया, इससे मुनिके शरीरमें क्रोधके चिह्न उत्पन्न हो गये ॥ ७ ॥