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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 1029
  • उत्तरकाण्ड *

१०२७

परम धर्ममय पय दुहि भाई । अवटै अनल अकाम बनाई ॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै । धृति सम जावनु देइ जमावै ॥

हे भाई! इस प्रकार (धर्माचारमें प्रवृत्त सात्त्विकी श्रद्धारूपी गौसे भाव, निवृत्ति और वशमें किये हुए निर्मल मनकी सहायतासे) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्निपर भलीभाँति औटावे । फिर क्षमा और संतोषरूपी हवासे उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम (मनका निग्रह)-रूपी जामन देकर उसे जमावे ॥ ७ ॥

मुदिताँ मथै विचार मथानी । दम अधार रजु सत्य सुबानी ॥ तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता । बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥

तब मुदिता (प्रसन्नता) रूपी कमोरीमें तत्त्वविचाररूपी मथानीसे दम (इन्द्रिय-दमन) के आधारपर (दमरूपी खँभे आदिके सहारे) सत्य और सुन्दर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमेंसे निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकाल ले ॥ ८ ॥

दो०—जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।

बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥ ११७ ( क ) ॥

तब योगरूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईधन लगा दे (सब कर्मोंको योगरूपी अग्निमें भस्म कर दे) । जब [वैराग्यरूपी मक्खनका] ममतारूपी मल जल जाय, तब [बचे हुए] ज्ञानरूपी घीको [निश्चयात्मिका] बुद्धिसे ठंढा करे ॥ ११७ ( क ) ॥

तब बिग्यानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ।

चित्तदिआ भरिधै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥ ११७ ( ख ) ॥

तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस [ज्ञानरूपी] निर्मल घीको पाकर उससे चित्तरूपी दियेको भरकर, समताकी दीवट बनाकर, उसपर उसे दृढ़तापूर्वक (जमाकर) रखे ॥ ११७ ( ख ) ॥

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।

तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि ॥ ११७ ( ग ) ॥

[जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति] तीनों अवस्थाएँ और [सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणरूपी कपाससे तुरीयावस्थारूपी रूईको निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावे ॥ ११७ ( ग ) ॥

सो०—एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।

जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ॥ ११७ ( घ ) ॥

इस प्रकार तेजकी राशि विज्ञानमय दीपकको जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जायें ॥ ११७ ( घ ) ॥