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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1030, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1030

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  • रामचरितमानस *

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा । दीप सिखा सोड़ परम प्रचंडा ॥ आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥

‘सोऽहमस्मि’ (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखण्ड (तैलधारावत् कभी न टूटनेवाली) वृत्ति है वही [उस ज्ञानदीपकको] परम प्रचण्ड दीपशिखा (लौ) है। [इस प्रकार] जब आत्मानुभवके सुखका सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसारके मूल भेदरूपी भ्रमका नाश हो जाता है, ॥ १ ॥

प्रबल अविद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥ तब सोड़ बुद्धि पाड़ उँजिआरा । उर गूहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥

और महान् बलवती अविद्याके परिवार मोह आदिका अपार अन्धकार मिट जाता है। तब वही (विज्ञानरूपिणी) बुद्धि [आत्मानुभवरूप] प्रकाशको पाकर हृदयरूपी घरमें बैठकर उस जड़-चेतनकी गाँठको खोलती है ॥ २ ॥

छोरन ग्रंथि पाव जौँ सोई । तब यह जीव कृतारथ होई ॥ छोरत ग्रंथि जानि खगराया । बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥

यदि वह (विज्ञानरूपिणी बुद्धि) उस गाँठको खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो। परन्तु हे पक्षिराज गरुड़जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेकों विघ्न करती है ॥ ३ ॥

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई ॥ कल बल छल करि जाहिं समीपा । अंचल बात बुझावहिं दीपा ॥

हे भाई! वह बहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियोंको भेजती है, जो आकर बुद्धिको लोभ दिखाती हैं। और वे ऋद्धि-सिद्धियाँ कल (कला), बल और छल करके समीप जाती और आँचलकी वायुसे उस ज्ञानरूपी दीपकको बुझा देती हैं ॥ ४ ॥

होइ बुद्धि जौँ परम सयानी । तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥ जौँ तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी । तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी ॥

यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई, तो वह उन (ऋद्धि-सिद्धियों) को अहितकर (हानिकर) समझकर उनकी ओर ताकती नहीं। इस प्रकार यदि मायाके विघ्नोंसे बुद्धिको बाधा न हुई, तो फिर देवता उपाधि (विघ्न) करते हैं ॥ ५ ॥

इंद्री द्वार झरोखा नाना । तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥ आवत देखहिं बिषय बयारी । ते हठि देहिं कपाट उधारी ॥

इन्द्रियोंके द्वार हृदयरूपी घरके अनेकों झरोखे हैं। वहाँ-वहाँ (प्रत्येक झरोखेपर) देवता थाना किये (अड्डा जमाकर) बैठे हैं। ज्यों ही वे विषयरूपी हवाको आते देखते हैं त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं ॥ ६ ॥