भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 103
  • बालकाण्ड *

१०१

तुरंत ही सब जीव वैसे ही सुखी हो गये जैसे मतवाले (नशा पिये हुए ) लोग मद (नशा) उतर जानेपर सुखी होते हैं। दुरार्थ (जिनको पराजित करना अत्यन्त ही कठिन है) और दुर्गम (जिनका पार पाना कठिन है) भगवान् (सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यरूप छः ईश्वरीय गुणोंसे युक्त) रुद्र (महाभयङ्कर) शिवजीको देखकर कामदेव भयभीत हो गया ॥ २ ॥

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई । मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा । कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥

लौट जानेमें लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मनमें मरनेका निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुन्दर ऋतुराज वसन्तको प्रकट किया। फूले हुए नये-नये वृक्षोंकी कतारें सुशोभित हो गयीं ॥ ३ ॥

बन उपबन बापिका तड़ागा । परम सुभग सब दिसा बिभागा ॥ जहाँ तहाँ जनु उमगत अनुरागा । देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा ॥

वन-उपवन, बावली-तालाब और सब दिशाओंके विभाग परम सुन्दर हो गये। जहाँ-तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा है, जिसे देखकर मेरे मनोमें भी कामदेव जाग उठा ॥ ४ ॥

छं०—जागड़ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही । सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा । कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ॥

मेरे हुए मनमें भी कामदेव जागने लगा, वनकी सुन्दरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्निका सच्चा मित्र शीतल-मन्द-सुगन्धित पवन चलने लगा। सरोवरोंमें अनेकों कमल खिल गये, जिनपर सुन्दर भौरोंके समूह गुंजार करने लगे। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं।

दो०—सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत । चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत ॥ ८६ ॥

कामदेव अपनी सेनासमेत करोड़ों प्रकारकी सब कलाएँ (उपाय) करके हार गया, पर शिवजीकी अचल समाधि न डिगी। तब कामदेव क्रोधित हो उठा ॥ ८६ ॥

देखि रसाल बिटप बर सारखा । तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ॥ सुमन चाप निज सर संधाने । अति रिस ताकि श्रवन लणि ताने ॥