भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

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  • रामचरितमानस *

आमके वृक्षकी एक सुन्दर डाली देखकर मनमें क्रोधसे भरा हुआ कामदेव उसपर चढ़ गया। उसने पुष्प-धनुषपर अपने [पाँचों] बाण चढ़ाये और अत्यन्त क्रोधसे [लक्ष्यकी ओर] ताककर उन्हें कानतक तान लिया ॥ १ ॥

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे । छूटि समाधि संभु तब जागे ॥ भयउ ईस मन छोभु बिसेषी । नयन उधारि सकल दिसि देखी ॥

कामदेवने तीक्ष्ण पाँच बाण छोड़े, जो शिवजीके हृदयमें लगे। तब उनकी समाधि टूट गयी और वे जाग गये। ईश्वर (शिवजी) के मनमें बहुत शोभ हुआ। उन्होंने आँखें खोलकर सब ओर देखा ॥ २ ॥

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका । भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका ॥ तब सिर्वै तीसर नयन उधारा । चितवत कामु भयउ जरि छारा ॥

जब आमके पतोंमें [छिपे हुए] कामदेवको देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ, जिससे तीनों लोक काँप उठे। तब शिवजीने तीसरा नेत्र खोला, उनके देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया ॥ ३ ॥

हाहाकार भयउ जग भारी । डरपे सुर भए असुर सुखारी ॥ समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी । भए अकंटक साधक जोगी ॥

जगत्में बड़ा हाहाकार मच गया। देवता डर गये, दैत्य सुखी हुए। भोगी लोग कामसुखको याद करके चिन्ता करने लगे और साधक योगी निष्कंटक हो गये ॥ ४ ॥

छं०— जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई । रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई ॥ अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही । प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही ॥

योगी निष्कंटक हो गये, कामदेवकी स्त्री रति अपने पतिकी यह दशा सुनते ही मूर्च्छित हो गयी। रोती-चिल्लाती और भाँति-भाँतसे करुणा करती हुई वह शिवजीके पास गयी। अत्यन्त प्रेमके साथ अनेकों प्रकारसे विनती करके हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गयी। शीघ्र प्रसन्न होनेवाले कृपालु शिवजी अबला (असहाया स्त्री) को देखकर सुन्दर (उसको सान्त्वना देनेवाले) वचन बोले—

दो०— अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु ।

बिनु बपु व्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु ॥ ८७ ॥

हे रति! अबसे तेरे स्वामीका नाम अनङ्ग होगा। वह बिना ही शरीरके सबको व्यापेगा। अब तू अपने पतिसे मिलनेकी बात सुन ॥ ८७ ॥