भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 105
  • बालकाण्ड *

१०३

जब जदुबंस कृष्ण अवतारा । होइहि हरन महा महिभारा ॥ कृष्ण तनय होइहि पति तोरा । बचनु अन्यथा होइ न मोरा ॥

जब पृथ्वीके बड़े भारी भारको उतारनेके लिये यदुवंशमें श्रीकृष्णका अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूपमें उत्पन्न होगा। मेरा यह बचन अन्यथा नहीं होगा ॥ १ ॥

रति गवनी सुनि संकर बानी । कथा अपर अब कहउँ बखानी ॥ देवन्ह समाचार सब पाए । ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए ॥

शिवजीके वचन सुनकर रति चली गयी। अब दूसरी कथा बखानकर (विस्तारसे) कहता हूँ। ब्रह्मादि देवताओंने ये सब समाचार सुने तो वे बैकुण्ठको चले ॥ २ ॥

सब सुर बिष्णु विरंचि समेता । गए जहाँ सिव कृपानिकेता ॥ पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा । भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा ॥

फिर वहाँसे विष्णु और ब्रह्मासहित सब देवता वहाँ गये जहाँ कृपाके धाम शिवजी थे। उन सबने शिवजीकी अलग-अलग स्तुति की, तब शशिभूषण शिवजी प्रसन्न हो गये ॥ ३ ॥

बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतू ॥ कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी । तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥

कृपाके समुद्र शिवजी बोले—हे देवताओ! कहिये, आप किसलिये आये हैं? ब्रह्माजीने कहा—हे प्रभो! आप अन्तर््यामी हैं, तथापि हे स्वामी! भक्तिवश मैं आपसे विनती करता हूँ ॥ ४ ॥

दो०—सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।

निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु ॥ ८८ ॥

हे शङ्कर! सब देवताओंके मनमें ऐसा परम उत्साह है कि हे नाथ! वे अपनी आँखोंसे आपका विवाह देखना चाहते हैं ॥ ८८ ॥

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन । सोड़ कछु करहु मदन मद मोचन ॥ कामु जरि रति कहैं बरु दीन्हा । कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा ॥

हे कामदेवके मदको चूर करनेवाले! आप ऐसा कुछ कीजिये जिससे सब लोग इस उत्सवको नेत्र भरकर देखें। हे कृपाके सागर! कामदेवको भस्म करके आपने रतिको जो वरदान दिया सो बहुत ही अच्छा किया ॥ १ ॥

सासति करि पुनि करहिं पसाऊ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ ॥ पारबतीं तपु कीन्ह अपारा । करहु तासु अब अंगीकारा ॥