भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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  • रामचरितमानस *

हे नाथ! श्रेष्ठ स्वामियोंका यह सहज स्वभाव ही है कि वे पहले दण्ड देकर फिर कृपा किया करते हैं। पार्वतीने अपार तप किया है, अब उन्हें अङ्गीकार कीजिये ॥ २ ॥

सुनि बिधि बिनय समुद्धि प्रभु बानी । ऐसेड़ होउ कहा सुखु मानी ॥ तब देवन्ह दुंदुभीं बजाई । बरषि सुमन जय जय सुर साई ॥

ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंको याद करके शिवजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘ऐसा ही हो।’ तब देवताओंने नगाड़े बजाये और फूलोंकी वर्षा करके ‘जय हो! देवताओंके स्वामीकी जय हो!’ ऐसा कहने लगे ॥ ३ ॥

अवसरु जानि ससरिषि आए । तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए ॥ प्रथम गए जहँ रहीं भवानी । बोले मधुर बचन छल सानी ॥

उचित अवसर जानकर ससरिषि आये और ब्रह्माजीने तुरंत ही उन्हें हिमाचलके घर भेज दिया। वे पहले वहाँ गये जहाँ पार्वतीजी थीं और उनसे छलसे भरे मीठे (विनोदयुक्त, आनन्द पहुँचानेवाले) वचन बोले— ॥ ४ ॥

दो०—कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।

अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस ॥ ८९ ॥

नारदजीके उपदेशसे तुमने उस समय हमारी बात नहीं सुनी। अब तो तुम्हारा प्रण झूठा हो गया, क्योंकि महादेवजीने कामको ही भस्म कर डाला ॥ ८९ ॥

मासपारायण, तीसरा विश्राम

सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी । उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी ॥ तुम्हरेँ जान कामु अब जारा । अब लगि संभु रहे सबिकारा ॥

यह सुनकर पार्वतीजी मुसकराकर बोलीं—हे विज्ञानी मुनिवरों! आपने उचित ही कहा। आपकी समझमें शिवजीने कामदेवको अब जलाया है, अबतक तो वे विकारयुक्त (कामी) ही रहे! ॥ १ ॥

हमरेँ जान सदा सिव जोगी । अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥ जौँ मैं सिव सेये अस जानी । प्रीति समेत कर्म मन बानी ॥

किन्तु हमारी समझसे तो शिवजी सदासे ही योगी, अजन्मा, अनिन्द्य, कामरहित और भोगहीन हैं और यदि मैंने शिवजीको ऐसा समझकर ही मन, वचन और कर्मसे प्रेमसहित उनकी सेवा की है— ॥ २ ॥

तौ हमार पन सुनुहु मुनीसा । करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा ॥ तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा । सोड़ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा ॥