श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1032, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
संत, पुराण, वेद और [तन्त्र आदि] शास्त्र [सब] यह कहते हैं कि कैवल्यरूप परमपद अत्यन्त दुर्लभ है; किन्तु हे गोसाईं! वही [अत्यन्त दुर्लभ] मुक्ति श्रीरामजीको भजनेसे बिना इच्छा किये भी जबरदस्ती आ जाती है ॥ २ ॥
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोउ करै उपाई ॥ तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई । रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥
जैसे स्थलके बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकारके उपाय क्यों न करे। वैसे ही, हे पक्षिराज! सुनिये, मोक्षसुख भी श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर नहीं रह सकता ॥ ३ ॥
अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥ भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अविद्या नासा ॥
ऐसा विचारकर बुद्धिमान् हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं। भक्ति करनेसे संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना ही यत्न और परिश्रमके (अपने-आप) वैसे ही नष्ट हो जाती है, ॥ ४ ॥
भोजन करिअ तृप्तिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥ असि हरि भगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥
जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराग्नि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टाके) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा? ॥ ५ ॥
दो०—सेवक सेव्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥ ११९ ( क ) ॥
हे सर्पके शत्रु गरुड़जी! मैं सेवक हूँ और भगवान् मेरे सेव्य (स्वामी) हैं, इस भावके बिना संसाररूपी समुद्रसे तरना नहीं हो सकता। ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंका भजन कीजिये ॥ ११९ (क) ॥
जो चेतन कहैं जड़ करड़ जड़हि करड़ चैतन्य।
अस समर्थ रघुनाथकहि भजहिं जीव ते धन्य ॥ ११९ ( ख ) ॥
जो चेतनको जड़ कर देता है और जड़को चेतन कर देता है, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं ॥ ११९ (ख) ॥
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई । सुनुहु भगति मनि कै प्रभुताई ॥ राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर ॥