श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1033, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१०३१
मैंने ज्ञानका सिद्धान्त समझाकर कहा। अब भक्तिरूपी मणिकी प्रभुता (महिमा) सुनिये। श्रीरामजीकी भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है। हे गरुड़जी! यह जिसके हृदयके अंदर बसती है, ॥ १ ॥
परम प्रकास रूप दिन राती । नहीं कछु चहिअ दिया घृत बाती ॥ मोह दरिद्र निकट नहीं आवा । लोभ बात नहीं ताहि बुझावा ॥
वह दिन-रात [अपने-आप ही] परम प्रकाशरूप रहता है। उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। [इस प्रकार मणिका एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है] फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती [क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है]; और [तीसरे] लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपको बुझा नहीं सकती, [क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरेकी सहायतासे नहीं प्रकाश करती] ॥ २ ॥
प्रबल अविद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥ खल कामादि निकट नहीं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं ॥
[उसके प्रकाशसे] अविद्याका प्रबल अन्धकार मिट जाता है। मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है। जिसके हृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते ॥ ३ ॥
गरल सुधासम अरि हित होई । तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥ व्यापहिं मानस रोग न भारी । जिन्ह के बस सब जीव दुखारी ॥
उसके लिये विष अमृतके समान और शत्रु मित्र हो जाता है। उस मणिके बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश होकर सब जीव दुखी हो रहे हैं, उसको नहीं व्यापते ॥ ४ ॥
राम भगति मनि उर बस जाकें । दुख लवल्लेस न सपनेहुँ ताकें ॥ चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं । जे मनि लागि सुजतन कराहीं ॥
श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदयमें बसती है, उसे स्वप्नमें भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत्में वे ही मनुष्य चतुरोंके शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणिके लिये भलीभाँति यत्न करते हैं ॥ ५ ॥
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई । राम कृपा बिनु नहीं कोउ लहई ॥ सुगम उपाय पाइबे केरे । नर हतभाग्य देहिं भटभरे ॥
यद्यपि वह मणि जगत्में प्रकट (प्रत्यक्ष) है, पर बिना श्रीरामजीकी कृपाके उसे कोई पा नहीं सकता। उसके पानेके उपाय भी सुगम ही हैं पर अभागे मनुष्य उन्हें टुकरा देते हैं ॥ ६ ॥
पावन पर्वत बेद पुराना । राम कथा रुचिराकर नाना ॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥