भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 259
  • बालकाण्ड *

२५७

बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥ सोड़ सूरता कि अब कहूँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥

अरे ! तुम्हारा बल, प्रताप, बीरता, बड़ाई और नाक (प्रतिष्ठा) तो धनुषके साथ ही चली गयी। वही बीरता थी कि अब कहींसे मिली है ? ऐसी दुष्ट बुद्धि है, तभी तो विधाताने तुम्हारे मुखोंपर कालिख लगा दी ॥४॥

दो०— देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।

लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥ २६६॥

ईर्ष्या, घमंड और क्रोध छोड़कर नेत्र भरकर श्रीरामजी [की छबि] को देख लो। लक्ष्मणके क्रोधको प्रबल अग्नि जानकर उसमें पतंगे मत बनो ॥२६६॥

बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥ जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥

जैसे गरुड़का भाग कौआ चाहे, सिंहका भाग खरगोश चाहे, बिना कारण ही क्रोध करनेवाला अपनी कुशल चाहे, शिवजीसे विरोध करनेवाला सब प्रकारकी सम्पत्ति चाहे, ॥१॥

लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥ हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥

लोभी-लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी मनुष्य निष्कलंकता [चाहे तो] क्या पा सकता है ? और जैसे श्रीहरिके चरणोंसे विमुख मनुष्य परमगति (मोक्ष) चाहे, हे राजाओ ! सीताके लिये तुम्हारा लालच भी वैसा ही व्यर्थ है ॥२॥

कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाड़ गई जहँ रानी॥ रामु सुभायै चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥

कोलाहल सुनकर सीताजी शंकित हो गयीं। तब सखियाँ उन्हें वहाँ ले गयीं जहाँ रानी (सीताजीकी माता) थीं। श्रीरामचन्द्रजी मनमें सीताजीके प्रेमका बखान करते हुए स्वाभाविक चालसे गुरुजीके पास चले ॥३॥

रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौँ बिधिहि काह करनीया॥ भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥

रानियोंसहित सीताजी [दुष्ट राजाओंके दुर्वचन सुनकर] सोचके वश हैं कि न जाने विधाता अब क्या करनेवाले हैं। राजाओंके वचन सुनकर लक्ष्मणजी इधर-उधर ताकते हैं; किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके डरसे कुछ बोल नहीं सकते ॥४॥