भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 260

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  • रामचरितमानस *

दो०— अरुन नयन भूकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप ।

मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंधकिसोरहि चोप ॥ २६७ ॥

उनके नेत्र लाल और भाँहें टेढ़ी हो गयीं और वे क्रोधसे राजाओंकी ओर देखने लगे; मानो मतवाले हाथियोंका झुंड देखकर सिंहके बच्चेको जोश आ गया हो ॥ २६७ ॥

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं । सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं ॥

तेहिं अवसर सुनि सिवधनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा ॥

खलबली देखकर जनकपुरकी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं और सब मिलकर राजाओंको गालियाँ देने लगीं। उसी मौकेपर शिवजीके धनुषका टूटना सुनकर भृगुकुलरूपी कमलके सूर्य परशुरामजी आये ॥ १ ॥

देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ॥

गौरि सरीर भूति भल भ्राजा । भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा ॥

इन्हें देखकर सब राजा सकुचा गये, मानो बाजके झपटनेपर बटेर लुक (छिप) गये हों। गौरि शरीरपर विभूति (भस्म) बड़ी फब रही है और विशाल ललाटपर त्रिपुण्ड्र विशेष शोभा दे रहा है ॥ २ ॥

सीस जटा ससिबदनु सुहावा । रिसबस कछुक अरुन होइ आवा ॥

भूकुटी कुटिल नयन रिस राते । सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ॥

सिरपर जटा है, सुन्दर मुखचन्द्र क्रोधके कारण कुछ लाल हो आया है। भाँहें टेढ़ी और आँखें क्रोधसे लाल हैं। सहज ही देखते हैं, तो भी ऐसा जान पड़ता है मानो क्रोध कर रहे हैं ॥ ३ ॥

बृषभ कंध उर बाहु बिसाला । चारु जनैउ माल मृगछाला ॥

कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें । धनु सर कर कुठारु कल काँधें ॥

बैलके समान (ऊँचे और पुष्ट) कंधे हैं; छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये, माला पहने और मृगचर्म लिये हैं। कमरमें मुनियोंका वस्त्र (वलकल) और दो तरकस बाँधे हैं। हाथमें धनुष-बाण और सुन्दर कंधेपर फरसा धारण किये हैं ॥ ४ ॥

दो०— सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप ।

धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहाँ सब भूप ॥ २६८ ॥

शान्त वेष है, परन्तु करनी बहुत कठोर है; स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीर-रस ही मुनिका शरीर धारण करके, जहाँ सब राजालोग हैं वहाँ आ गया हो ॥ २६८ ॥

देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय बिकल भुआला ॥

पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड प्रनामा ॥

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