श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२७३
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा । प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा ॥ मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाई । अब जो उचित सो कहिअ गोसाई ॥
जनकजीने विश्वामित्रजीको प्रणाम किया [और कहा—] प्रभुहीकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयोंने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिये ॥ ३ ॥
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना । रहा बिबाहु चाप आधीना ॥ टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू । सुर नर नाग बिदित सब काहू ॥
मुनिने कहा—हे चतुर नरेश! सुनो, यों तो विवाह धनुषके अधीन था; धनुषके टूटते ही विवाह हो गया। देवता, मनुष्य और नाग सब किसीको यह मालूम है ॥ ४ ॥
दो०—तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस व्यवहारु ।
बूझि बिप्र कुलबूद्ध गुर बेद बिदित आचारु ॥ २८६ ॥
तथापि तुम जाकर अपने कुलका जैसा व्यवहार हो, ब्राह्मणों, कुलके बूढ़ों और गुरुओंसे पूछकर और वेदोंमें वर्णित जैसा आचार हो वैसा करो ॥ २८६ ॥
दूत अवधपुर पठवहु जाई । आनहिं नृप दसरथहि बोलाई ॥ मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला । पठए दूत बोलि तेहि काला ॥
जाकर अयोध्याको दूत भेजो, जो राजा दशरथको बुला लावें। राजाने प्रसन्न होकर कहा—हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय दूतोंको बुलाकर भेज दिया ॥ १ ॥
बहरि महाजन सकल बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिर नाए ॥ हाट बाट मंदिर सुरबासा । नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा ॥
फिर सब महाजनोंको बुलाया और सबने आकर राजाको आदरपूर्वक सिर नवाया। [राजाने कहा—] बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगरको चारों ओरसे सजाओ ॥ २ ॥
हरषि चले निज निज गृह आए । पुनि परिचारक बोलि पठाए ॥ रचहु बिचित्र बितान बनाई । सिर धरि बचन चले सचु पाई ॥
महाजन प्रसन्न होकर चले और अपने-अपने घर आये। फिर राजाने नौकरोंको बुला भेजा [और उन्हें आज्ञा दी कि] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो। यह सुनकर वे सब राजाके वचन सिरपर धरकर और सुख पाकर चले ॥ ३ ॥
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना । जे बितान बिधि कुसल सुजाना ॥ बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा । बिरचे कनक कदलि के खंभा ॥
उन्होंने अनेक कारीगरोंको बुला भेजा, जो मण्डप बनानेमें कुशल और चतुर थे। उन्होंने ब्रह्माकी वन्दना करके कार्य आरम्भ किया और [पहले] सोनेके केलेके खंभे बनाये ॥ ४ ॥