भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • रामचरितमानस *

दो०— हरित मनिह के पत्र फल पदुमराग के फूल। रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल ॥ २८७ ॥

हरी-हरी मणियों (पत्रे) के पत्ते और फल बनाये तथा पद्मराग मणियों (माणिक) के फूल बनाये। मण्डपकी अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्माका मन भी भूल गया ॥ २८७ ॥

बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे । सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे ॥ कनक कलित अहिबेलि बनाई । लखि नहिं परइ सपरन सुहाई ॥

बाँस सब हरी-हरी मणियों (पत्रे) के सीधे और गाँठोंसे युक्त ऐसे बनाये जो पहचाने नहीं जाते थे [कि मणियोंके हैं या साधारण]। सोनेकी सुन्दर नागबेलि (पानकी लता) बनायी, जो पत्तोंसहित ऐसी भली मालूम होती थी कि पहचानी नहीं जाती थी ॥ १ ॥

तेहि के रचि पचि बंध बनाए । बिच बिच मुकुता दाम सुहाए ॥ मानिक मरकत कुलिस पिरोजा । चीरि कोरि पचि रचे सरोजा ॥

उसी नागबेलिके रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन (बाँधनेकी रस्सी) बनाये। बीच-बीचमें मोतियोंकी सुन्दर झालरें हैं। माणिक, पत्रे, हीरे और फिरोजे, इन रत्नोंको चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंगके] कमल बनाये ॥ २ ॥

किए भूंग बहुरंग बिहंगा । गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा ॥ सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ीं । मंगल द्रव्य लिऐं सब ठाढ़ीं ॥

भौर और बहुत रंगोंके पक्षी बनाये, जो हवाके सहारे गुँजते और कूजते थे। खंभोंपर देवताओंकी मूर्तियाँ गढ़कर निकालीं, जो सब मङ्गलद्रव्य लिये खड़ी थीं ॥ ३ ॥

चौकें भाँति अनेक पुराई । सिंधुर मनिमय सहज सुहाई ॥

गजमुक्ताओंके सहज ही सुहावने अनेकों तरहके चौक पुराये ॥ ४ ॥

दो०— सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।

हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि ॥ २८८ ॥

नीलमणिको कोरकर अत्यन्त सुन्दर आमके पत्ते बनाये। सोनेके बौर (आमके फूल) और रेशमकी डोरीसे बँधे हुए पत्रेके बने फलोंके गुच्छे सुशोभित हैं ॥ २८८ ॥

रचे रुचिर बर बंदनिवारे । मनहुँ मनोभर्व फंद सँवारे ॥

मंगल कलस अनेक बनाए । ध्वज पताक पट चमर सुहाए ॥

ऐसे सुन्दर और उत्तम बंदनवार बनाये मानो कामदेवने फंदे सजाये हों। अनेकों मङ्गल-कलश और सुन्दर ध्वजा, पताका, परदे और चँवर बनाये ॥ १ ॥