श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२७५
दीप मनोहर मनिमय नाना । जाड़ न बरनि बिचित्र बिताना ॥ जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही । सो बरनै असि मति कबि केही ॥
जिसमें मणियोंके अनेकों सुन्दर दीपक हैं, उस विचित्र मण्डपका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। जिस मण्डपमें श्रीजानकीजी दुलहिन होंगी, किस कविकी ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके ॥ २ ॥
दूलहु रामु रूप गुन सागर । सो बितानु तिहुँ लोक उजागर ॥ जनक भवन कै सोभा जैसी । गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी ॥
जिस मण्डपमें रूप और गुणोंके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होना ही चाहिये। जनकजीके महलकी जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगरके प्रत्येक घरकी दिखायी देती है ॥ ३ ॥
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी । तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी ॥ जो संपदा नीच गृह सोहा । सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥
उस समय जिसने तिरहुतको देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े। जनकपुरमें नीचके घर भी उस समय जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता था ॥ ४ ॥
दो०— बसइ नगर जेहिं लच्छ करि कपट नारि बर बेषु । तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचाहिं सारद सेषु ॥ २८९ ॥
जिस नगरमें साक्षात् लक्ष्मीजी कपटसे स्त्रीका सुन्दर वेष बनाकर बसती हैं, उस पुरकी शोभाका वर्णन करनेमें सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं ॥ २८९ ॥
पहुँचे दूत राम पुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥ भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई । दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई ॥
जनकजीके दूत श्रीरामचन्द्रजीकी पवित्र पुरी अयोध्यामें पहुँचे। सुन्दर नगर देखकर वे हर्षित हुए। राजद्वारपर जाकर उन्होंने खबर भेजी; राजा दशरथजीने सुनकर उन्हें बुला लिया ॥ १ ॥
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही । मुदित महीप आपु उठि लीन्ही ॥ बारि बिलोचन बाँचत पाती । पुलक गात आई भरि छाती ॥
दूतोंने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजाने स्वयं उठकर उसे लिया। चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रोंमें जल (प्रेम और आनन्दके आँसू) छा गया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी ॥ २ ॥