भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • रामचरितमानस *

मंगल सगुन सुगंध सुहाए । बहुत भाँति महिपाल पठाए ॥ दधि चिउरा उपहार अपारा । भरि भरि काँवरि चले कहारा ॥

तथा बहुत प्रकारके सुगन्धित एवं सुहावने मङ्गल-द्रव्य और सगुनके पदार्थ राजाने भेजे । दही, चिउड़ा और अगणित उपहारकी चीजें काँवरोंमें भर-भरकर कहार चले ॥ ३ ॥

अगवानन्ह जब दीखि बराता । उर आनंदु पुलक भर गाता ॥ देखि बनाव सहित अगवाना । मुदित बरातिन्ह हने निसाना ॥

अगवानी करनेवालोंको जब बारात दिखायी दी, तब उनके हृदयमें आनन्द छा गया और शरीर रोमाञ्चसे भर गया । अगवानोंको सज-धजके साथ देखकर बरातियोंने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाये ॥ ४ ॥

दो०—हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल ।

जनु आनंद समुद्र दुड़ मिलत बिहाड़ सुबेल ॥ ३०५ ॥

[बराती तथा अगवानोंमेंसे] कुछ लोग परस्पर मिलनेके लिये हर्षके मारे बाग छोड़कर (सरपट) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनन्दके दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों ॥ ३०५ ॥

बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं । मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं ॥ बस्तु सकल राखीं नृप आगें । बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें ॥

देवसुन्दरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनन्दित होकर नगाड़े बजा रहे हैं । [अगवानीमें आये हुए] उन लोगोंने सब चीजें दशरथजीके आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेमसे विनती की ॥ १ ॥

प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा । भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा ॥ करि पूजा मान्यता बड़ाई । जनवासे कहूँ चले लवाई ॥

राजा दशरथजीने प्रेमसहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकोंको दे दी गयीं । तदनन्तर पूजा, आदर-सत्कार और बड़ाई करके अगवान लोग उनको जनवासेकी ओर लवा ले चले ॥ २ ॥

बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं । देखि धनदु धन मदु परिहरहीं ॥ अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा । जहाँ सब कहूँ सब भाँति सुपासा ॥

विलक्षण वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धनका अभिमान छोड़ देते हैं । बड़ा सुन्दर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको सब प्रकारका सुभीता था ॥ ३ ॥