श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२८९
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥ हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई॥
सीताजीने बारात जनकपुरमें आयी जानकर अपनी कुछ महिमा प्रकट करके दिखलायी। हृदयमें स्मरणकर सब सिद्धियोंको बुलाया और उन्हें राजा दशरथजीकी मेहमानी करनेके लिये भेजा ॥ ४ ॥
दो०— सिधि सब सिय आयसु अकनि गई जहाँ जनवास।
लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास ॥ ३०६ ॥
सीताजीकी आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ जहाँ जनवासा था वहाँ सारी सम्पदा, सुख और इन्द्रपुरीके भोग-विलासको लिये हुए गयीं ॥ ३०६ ॥
निज निज बास बिलोकि बराती। सुरसुख सकल सुलभ सब भाँती ॥
बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिँ बखाना ॥
बरातियोंने अपने-अपने ठहरनेके स्थान देखे तो वहाँ देवताओंके सब सुखोंको सब प्रकारसे सुलभ पाया। इस ऐश्वर्यका कुछ भी भेद कोई जान न सका। सब जनकजीकी बड़ाई कर रहे हैं ॥ १ ॥
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी ॥
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई ॥
श्रीरघुनाथजी यह सब सीताजीकी महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदयमें हर्षित हुए। पिता दशरथजीके आनेका समाचार सुनकर दोनों भाइयोंके हृदयमें महान् आनन्द समाता न था ॥ २ ॥
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं ॥
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी ॥
संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजीसे कह नहीं सकते थे; परन्तु मनमें पिताजीके दर्शनोंकी लालसा थी। विश्वामित्रजीने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हृदयमें बहुत संतोष उत्पन्न हुआ ॥ ३ ॥
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए ॥
चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे ॥
प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयोंको हृदयसे लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें (प्रेमाश्रुओंका) जल भर आया। वे उस जनवासेको चले, जहाँ दशरथजी थे। मानो सरोवर प्यासेकी ओर लक्ष्य करके चला हो ॥ ४ ॥
दो०— भूप बिलोके जबहिँ मुनि आवत सुतन्ह समेत।
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत ॥ ३०७ ॥