भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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२९०

  • रामचरितमानस *

जब राजा दशरथजीने पुत्रोंसहित मुनिको आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुखके समुद्रमें थाह-सी लेते हुए चले ॥ ३०७ ॥

मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा । बार बार पद रज धरि सीसा ॥ कौसिक राउ लिए उर लाई । कहि असीस पूछी कुसलाई ॥

पृथ्वीपति दशरथजीने मुनिकी चरणभूलिको बारंबार सिरपर चढ़ाकर उनको दण्डवत् प्रणाम किया। विश्वामित्रजीने राजाको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी ॥ १ ॥

पुनि दंडवत करत दोउ भाई । देखि नृपति उर सुखु न समाई ॥ सुत हिर्घै लाइ दुसह दुख मेटे । मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे ॥

फिर दोनों भाइयोंको दण्डवत् प्रणाम करते देखकर राजाके हृदयमें सुख समाया नहीं। पुत्रोंको [उठाकर] हृदयसे लगाकर उन्होंने अपने [वियोगजनित] दुःसह दुःखको मिटया। मानो मृतक शरीरको प्राण मिल गये हों ॥ २ ॥

पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए । प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए ॥ बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाई । मनभावती असीसें पाई ॥

फिर उन्होंने बसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठने प्रेमके आनन्दमें उन्हें हृदयसे लगा लिया। दोनों भाइयोंने सब ब्राह्मणोंकी वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाये ॥ ३ ॥

भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा । लिए उठाइ लाइ उर रामा ॥ हरषे लखन देखि दोउ भ्राता । मिले प्रेम परिपूरित गाता ॥

भरतजीने छोटे भाई शत्रुघ्नसहित श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। श्रीरामजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया। लक्ष्मणजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए और प्रेमसे परिपूर्ण हुए शरीरसे उनसे मिले ॥ ४ ॥

दो०—पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।

मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत ॥ ३०८ ॥

तदनन्तर परम कृपालु और विनयी श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यावासियों, कुटुम्बियों, जातिके लोगों, याचकों, मन्त्रियों और मित्रों—सभीसे यथायोग्य मिले ॥ ३०८ ॥

रामहि देखि बरात जुड़ानी । प्रीति कि रीति न जाति बखानी ॥ नृप समीप सोहहिँ सुत चारी । जनु धन धरमादिक तनुधारी ॥

श्रीरामचन्द्रजीको देखकर बारात शीतल हुई (रामके वियोगमें सबके हृदयमें जो आग जल रही थी, वह शान्त हो गयी)। प्रीतिकी रीतिका बखान नहीं हो सकता। राजाके पास चारों पुत्र ऐसी शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किये हुए हों ॥ १ ॥