भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 295
  • बालकाण्ड *

२१३

छं०— उपमान कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल विनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एड़ अहैं ॥ पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं। ब्याहिअहुँ चारिउ भाड़ एहिँ पुर हम सुमंगल गावहीं ॥

दास तुलसी कहता है कवि और कोबिद (विद्वान्) कहते हैं, इनकी उपमा कहीं कोई नहीं है। बल, विनय, विद्या, शील और शोभाके समुद्र इनके समान ये ही हैं। जनकपुरकी सब स्त्रियाँ अँचल फैलाकर विधाताको यह वचन (विनती) सुनाती हैं कि चारों भाइयोंका विवाह इसी नगरमें हो और हम सब सुन्दर मङ्गल गावें।

सो०— कहहिँ परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ ॥ ३११ ॥

नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भरकर पुलकित शरीरसे स्त्रियाँ आपसमें कह रही हैं कि हे सखी! दोनों राजा पुण्यके समुद्र हैं, त्रिपुरारि शिवजी सब मनोरथ पूर्ण करेंगे ॥ ३११ ॥

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं ॥ जे नृप सीय स्वयंवर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए ॥

इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदयको उमँग-उमँगकर (उत्साहपूर्वक) आनन्दसे भर रही हैं। सीताजीके स्वयंवरमें जो राजा आये थे, उन्होंने भी चारों भाइयोंको देखकर सुख पाया ॥ १ ॥

कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला ॥ गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती ॥

श्रीरामचन्द्रजीका निर्मल और महान् यश कहते हुए राजा लोग अपने-अपने घर गये। इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। जनकपुरनिवासी और बराती सभी बड़े आनन्दित हैं ॥ २ ॥

मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रिनु अगहनु मासु सुहावा ॥ ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू ॥

मङ्गलोंका मूल लगनका दिन आ गया। हेमन्त-ऋतु और सुहावना अगहनका महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। लगन (मुहूर्त) शोधकर ब्रह्मजीने उसपर विचार किया, ॥ ३ ॥

पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई ॥ सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिँ जोतिषी आहिँ बिधाता ॥