भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 296

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  • रामचरितमानस *

और उस (लग्नपत्रिका) को नारदजीके हाथ [जनकजीके यहाँ] भेज दिया। जनकजीके ज्योतिषियोंने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगोंने यह बात सुनी तब वे कहने लगे—यहाँके ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं ॥ ४ ॥

दो०— धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।

बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल ॥ ३१२ ॥

निर्मल और सभी सुन्दर मङ्गलोंकी मूल गोधूलिकी पवित्र वेला आ गयी और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राह्मणोंने जनकजीसे कहा ॥ ३१२ ॥

उपरोहितहि कहेउ नरनाहा । अब बिलंब कर कारनु काहा ॥ सतानंद तब सचिव बोलाए । मंगल सकल साजि सब ल्याए ॥

तब राजा जनकने पुरोहित शतानन्दजीसे कहा कि अब देरका क्या कारण है। तब शतानन्दजीने मन्त्रियोंको बुलाया। वे सब मङ्गलका सामान सजाकर ले आये ॥ १ ॥

संख निसान पनव बहु बाजे । मंगल कलस सगुन सुभ साजे ॥ सुभग सुआसिनि गावहिं गीता । करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता ॥

शङ्ख, नगाड़े, ढोल और बहुत-से बाजे बजने लगे तथा मङ्गल-कलश और शुभ शकुनकी वस्तुएँ (दधि, दूर्वा आदि) सजायी गयीं। सुन्दर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेदकी ध्वनि कर रहे हैं ॥ २ ॥

लेन चले सादर एहि भाँती । गए जहाँ जनवास बराती ॥ कोसलपति कर देखि समाजू । अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू ॥

सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारातको लेने चले और जहाँ बरातियोंका जनवासा था, वहाँ गये। अवधपति दशरथजीका समाज (वैभव) देखकर उनको देवराज इन्द्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे ॥ ३ ॥

भयउ समउ अब धारिअ पाऊ । यह सुनि परा निसानहिं घाऊ ॥ गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा । चले संग मुनि साधु समाजा ॥

[उन्होंने जाकर विनती की—] समय हो गया, अब पधारिये। यह सुनते ही नगाड़ोंपर चोट पड़ी। गुरु वसिष्ठजीसे पूछकर और कुलकी सब रीतियोंको करके राजा दशरथजी मुनियों और साधुओंके समाजको साथ लेकर चले ॥ ४ ॥

दो०— भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।

लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि ॥ ३१३ ॥

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