श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
नयन नीरु हटि मंगल जानी । परिछनि करहिं मुदित मन रानी ॥ बेद बिहित अरु कुल आचारु । कीन्ह भली बिधि सब व्यवहारु ॥
मङ्गल-अवसर जानकर नेत्रोंके जलको रोके हुए रानी प्रसन्न मनसे परछन कर रही हैं। वेदोंमें कहे हुए तथा कुलाचारके अनुसार सभी व्यवहार रानीने भलीभाँति किये ॥ १ ॥
पंच सबद धुनि मंगल गाना । पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना ॥ करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा । राम गमनु मंडप तब कीन्हा ॥
पञ्चशब्द (तन्त्री, ताल, झाँझ, नगारा और तुरही—इन पाँच प्रकारके बाजोंके शब्द), पञ्चध्वनि (वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शङ्खुध्वनि और हलूध्वनि) और मङ्गलगान हो रहे हैं। नाना प्रकारके वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ रहे हैं। उन्होंने (रानीने) आरती करके अर्घ्य दिया, तब श्रीरामजीने मण्डपमें गमन किया ॥ २ ॥
दसरथु सहित समाज बिराजे । बिभव बिलोकि लोकपति लाजे ॥ समयै समयै सुर बरषहिं फूला । सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला ॥
दशरथजी अपनी मण्डलीसहित विराजमान हुए। उनके वैभवको देखकर लोकपाल भी लजा गये। समय-समयपर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शान्ति-पाठ करते हैं ॥ ३ ॥
नभ अरु नगर कोलाहल होई । आपनि पर कछु सुनइ न कोई ॥ एहि बिधि रामु मंडपहिं आए । अरघु देइ आसन बैठाए ॥
आकाश और नगरमें शोर मच रहा है। अपनी-परायी कोई कुछ भी नहीं सुनता। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी मण्डपमें आये और अर्घ्य देकर आसनपर बैठाये गये ॥ ४ ॥
छं०—बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं । मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं ॥ ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं । अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं ॥
आसनपर बैठाकर, आरती करके दूलहको देखकर स्त्रियाँ सुख पा रही हैं। वे ढेर-के-ढेर मणि, वस्त्र और गहने निछावर करके मङ्गल गा रही हैं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मणका वेष बनाकर कौतुक देख रहे हैं। वे रघुकुलरूपी कमलके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर अपना जीवन सफल जान रहे हैं।