भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 303
  • बालकाण्ड *

३०१

दो०—नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।

मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ ॥ ३१९ ॥

नाई, बारी, भाट और नट श्रीरामचन्द्रजीकी निछावर पाकर आनन्दित हो सिर नवाकर आशिष देते हैं; उनके हृदयमें हर्ष समाता नहीं है ॥ ३१९ ॥

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं । करि बैदिक लौकिक सब रीतीं ॥

मिलत महा दोउ राज बिराजे । उपमा खोजि खोजि कबि लाजे ॥

वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनकजी और दशरथजी बड़े प्रेमसे मिले। दोनों महाराज मिलते हुए बड़े ही शोभित हुए, कवि उनके लिये उपमा खोज-खोजकर लजा गये ॥ १ ॥

लही न कतहुँ हारि हियँ मानी । इन्ह सम एइ उपमा उर आनी ॥

सामध देखि देव अनुरागे । सुमन बरषि जसु गावन लागे ॥

जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदयमें हार मानकर उन्होंने मनमें यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं। समर्थियोंका मिलाप या परस्पर सम्बन्ध देखकर देवता अनुरक्त हो गये और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे ॥ २ ॥

जगु बिरंचि उपजावा जब तें । देखे सुने ब्याह बहु तब तें ॥

सकल भाँति सम साजु समाजु । सम समधी देखे हम आजु ॥

[वे कहने लगे—] जबसे ब्रह्माजीने जगत्को उत्पन्न किया, तबसे हमने बहुत विवाह देखे-सुने; परन्तु सब प्रकारसे समान साज-समाज और बराबरीके (पूर्ण समतायुक्त) समधी तो आज ही देखे ॥ ३ ॥

देव गिरा सुनि सुंदर साँची । प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची ॥

देत पाँवड़े अरघु सुहाए । सादर जनकु मंडपहिं ल्याए ॥

देवताओंकी सुन्दर सत्यवाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा गयी। सुन्दर पाँवड़े और अर्घ्य देते हुए जनकजी दशरथजीको आदरपूर्वक मण्डपमें ले आये ॥ ४ ॥

छं०—मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।

निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे ॥

कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।

कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही ॥

मण्डपको देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरतासे मुनियोंके मन भी हरे गये (मोहित हो गये)। सुजान जनकजीने अपने हाथोंसे ला-लाकर सबके लिये सिंहासन रखे। उन्होंने अपने कुलके इष्टदेवताके समान वसिष्ठजीकी पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विश्वामित्रजीकी पूजा करते समयकी परम प्रीतिकी रीति तो कहते ही नहीं बनती।