भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 305
  • बालकाण्ड *

३०३

कौन किसको जाने-पहिचाने! सबको अपनी ही सुध भूली हुई है। आनन्दकन्द दूलहको देखकर दोनों और आनन्दमयी स्थिति हो रही है। सुजान (सर्वज्ञ) श्रीरामचन्द्रजीने देवताओंको पहचान लिया और उनकी मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिये। प्रभुका शील-स्वभाव देखकर देवगण मनमें बहुत आनन्दित हुए।

दो०—रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।

करत पान सादर सकल प्रेम प्रमोदु न थोर ॥ ३२१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी छबिको सभीके सुन्दर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और आनन्द कम नहीं है (अर्थात् बहुत है) ॥ ३२१ ॥

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए । सादर सतानंदु सुनि आए ॥

बेगि कुअँरि अब आनहु जाई । चले मुदित मुनि आयसु पाई ॥

समय देखकर वसिष्ठजीने शतानन्दजीको आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदरके साथ आये। वसिष्ठजीने कहा—अब जाकर राजकुमारीको शीघ्र ले आइये। मुनिकी आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले ॥ १ ॥

रानी सुनि उपरोहित बानी । प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी ॥

बिप्र बधू कुल बृद्ध बोलाई । करि कुलरीति सुमंगल गाई ॥

बुद्धिमती रानी पुरोहितकी वाणी सुनकर सखियोंसमेत बड़ी प्रसन्न हुई। ब्राह्मणोंकी स्त्रियों और कुलकी बूढ़ी स्त्रियोंको बुलाकर उन्होंने कुलरीति करके सुन्दर मङ्गलगीत गाये ॥ २ ॥

नारि बेष जे सुर बर बामा । सकल सुभायै सुंदरी स्यामा ॥

तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं । बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं ॥

श्रेष्ठ देवाङ्गनाएँ, जो सुन्दर मनुष्य-स्त्रियोंके वेषमें हैं, सभी स्वभावसे ही सुन्दरी और श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली) हैं। उनको देखकर रनिवासकी स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहचानके ही वे सबको प्राणोंसे भी प्यारी हो रही हैं ॥ ३ ॥

बार बार सनमानहिं रानी । उमा रमा सारद सम जानी ॥

सीय सँवारि समाजु बनाई । मुदित मंडपहिं चलीं लवाई ॥

उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वतीके समान जानकर रानी बार-बार उनका सम्मान करती हैं। [रनिवासकी स्त्रियाँ और सखियाँ] सीताजीका शृंगार करके, मण्डली बनाकर, प्रसन्न होकर उन्हें मण्डपमें लिवा चलीं ॥ ४ ॥

छं०—चलि त्याइ सीतहि सरखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं ।

नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं ॥

कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं ।

मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं ॥

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