भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306

३०४

  • रामचरितमानस *

सुन्दर मङ्गलका साज सजकर [रनिवासकी] स्त्रियाँ और सखियाँ आदरसहित सीताजीको लिवा चलीं। सभी सुन्दरियाँ सोलहों शृंगार किये हुए मतवाले हाथियोंकी चालसे चलनेवाली हैं। उनके मनोहर गानको सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेवकी कोयलें भी लजा जाती हैं। पायजेब, पैँजनी और सुन्दर कंकण तालकी गतिपर बड़े सुन्दर बज रहे हैं।

दो०—सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय।

छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय ॥ ३२२ ॥

सहज ही सुन्दरी सीताजी स्त्रियोंके समूहमें इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छबिरूपी ललनाओंके समूहके बीच साक्षात् परम मनोहर शोभारूपी स्त्री सुशोभित हो ॥ ३२२ ॥

सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई ॥

आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता ॥

सीताजीकी सुन्दरताका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि बहुत छोटी है और मनोहरता बहुत बड़ी है। रूपकी राशि और सब प्रकारसे पवित्र सीताजीको बरातियोंने आते देखा ॥ १ ॥

सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा ॥

हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता ॥

सभीने उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर तो सभी पूर्णकाम (कृतकृत्य) हो गये। राजा दशरथजी पुत्रोंसहित हर्षित हुए। उनके हृदयमें जितना आनन्द था, वह कहा नहीं जा सकता ॥ २ ॥

सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला ॥

गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी ॥

देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं। मङ्गलोंकी मूल मुनियोंके आशीर्वादोंकी ध्वनि हो रही है। गानों और नगाड़ोंके शब्दसे बड़ा शोर मच रहा है। सभी नर-नारी प्रेम और आनन्दमें मग्न हैं ॥ ३ ॥

एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई ॥

तेहि अवसर कर बिधि व्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू ॥

इस प्रकार सीताजी मण्डपमें आयीं। मुनिराज बहुत ही आनन्दित होकर शान्तिपाठ पढ़ रहे हैं। उस अवसरकी सब रीति, व्यवहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओंने किये ॥ ४ ॥

छं०—आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।

सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं ॥

मधुपर्क मंगल द्रव्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं।

भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं ॥

श्रीरामचरितमानस · पृष्ठ 306, कुल 1058 में से · BharatKosha